पदार्थान्वयभाषाः - [१] अब प्रथम पाँच मन्त्रों में सोम के महत्त्व के प्रतिपादन के बाद इस सोम के रक्षण करनेवाले पुरुष के साथ सूर्या के विवाह का उल्लेख ६ से १६ मन्त्रों तक किया गया है इस विवाह के समय (रैभी) = जिसके द्वारा प्रभु का स्तवन होता है वह ऋचा 'रैभी' कहलाती है यह रैभी ऋचा ही (अनुदेयी आसीत्) = दहेज थी, अर्थात् पिता कन्या को ऋचाओं के द्वारा प्रभुस्तवन की वृत्तिवाली बना देता है। यह स्तुति वृत्तिवाली बना देना ही सर्वोत्तम दहेज देना है। [२] (नाराशंसी) = नर समूह के शंसन की वृत्ति सबकी अच्छाइयों का ही कथन करने और कमियों को न कहने की वृत्ति ही इसकी (न्योचनी) = इसको ठीक आनेवाली इसकी कमीज होती है । स्तवन, न किं विन्दन, की वृत्ति ही उसके उचित वस्त्र हैं। अथवा (नाराशंसी) = वीर पुरुषों के चरित्रों का शंसन इनके इतिवृत्त का ज्ञान ही इसका समुचितवसन है। [३] (भद्रम्) = इसकी भद्रता [ शराफत ] (इत्)- = ही (वासः) = ओढ़ने का कपड़ा है जो (गाथया परिष्कृतम्) = गाथा से परिष्कृत हुआ हुआ एति इसे प्राप्त होता है। जैसे वस्त्रा किनारी आदि से सुभूषित होता है उसी प्रकार इसकी भद्रता का यह वस्त्र प्रभु गुणगान से सुभूषित है। संक्षेप में यह कन्या भद्र व्यवहारवाली है और प्रभु के गुणों के गायन की वृत्तिवाली है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - कन्या को स्तुति वृत्तिवाला बना देना ही सच्चा दहेज है। स्तवन, न कि निन्दन ही इसकी कमीज है। भद्रता ही वस्त्र है जो प्रभु गुणगायन से परिष्कृत है।