पति-पत्नी के हृदयों की एकता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विश्वे देवा:) = सब देव (नौ) = हमारे (हृदयानि) = हृदयों को (समञ्जन्तु) संगत करें। दिव्य गुणों की वृद्धि पारस्परिक प्रेम को बढ़ाने का प्रथम साधन है। (आप:) = जल (सम्) = [अञ्जन्तु] = हमारे हृदयों को संगत करें। हृदयैक्यता के लिये आवश्यक है कि पति-पत्नी पानी की तरह शान्त मस्तिष्कवाले तथा मधुरस्वभाववाले हों। पानी स्वभावतः शीतल है, ये भी ठण्डे मिजाज के हों । पानी मधुर है, ये भी मधुर स्वभाववाले बनें। [२] (मातरिश्वा) = वायु-शरीरस्थ प्राण, (सम्) = इनके हृदयों को मिलानेवाला हो। प्राणसाधना के द्वारा प्रेम का अभिवर्धन होता है। (धाता) = सबका धारण करनेवाला प्रभु (सम्) = इनको परस्पर एक करे । प्रभु स्मरण की वृत्ति पवित्रता के संचार के द्वारा प्रेम को बढ़ाती है । [३] (देष्ट्री) = जीवन के कर्त्तव्यों का निर्देश करनेवाली वेदवाणी (उ) = भी (नौ) = हमारे (संदधातु) = हृदयों का सन्धान करनेवाली हो। वेदवाणी के अनुसार कर्त्तव्यों का पालन करने पर परस्पर प्रेम में कभी कमी नहीं आती।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति पत्नी के हृदयों की एकता के लिये आवश्यक है कि - [क] वे दिव्यगुणों को अपने में बढ़ाएँ, [ख] जल की तरह शान्त व मधुर बने, [ग] प्राणसाधना करें, [घ] प्रभु- स्मरण की वृत्तिवाले हों, [ङ] वेदवाणी के अनुसार जीवन को बनाएँ । यह सारा सूक्त गृहस्थ के सब पहलुओं पर बड़ी सुन्दरता से प्रकाश डालता है। अगले सूक्त के ऋषि 'इन्द्र, इन्द्राणी, व वृषाकपि' हैं, 'इन्द्र' परमैश्वर्यशाली प्रभु हैं, इनका उपासन करनेवाला ऋषि भी 'इन्द्र' है। 'इन्द्राणी' प्रकृति व प्रभु का सामर्थ्य है, उसकी ओर झुकनेवाली ऋषिका भी 'इन्द्राणी' है। इनके सन्तान के तुल्य जीव 'वृषाकपि' है, जो शक्तिशाली है और वासनाओं को कम्पित करके दूर भगानेवाला है, वस्तुतः वासनाओं को कम्पित करके दूर भगाने के कारण ही वह शक्तिशाली बना है 'वृषाकपि' हुआ है। सूक्त का प्रारम्भ इस प्रकार है-