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ये व॒ध्व॑श्च॒न्द्रं व॑ह॒तुं यक्ष्मा॒ यन्ति॒ जना॒दनु॑ । पुन॒स्तान्य॒ज्ञिया॑ दे॒वा नय॑न्तु॒ यत॒ आग॑ताः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ye vadhvaś candraṁ vahatuṁ yakṣmā yanti janād anu | punas tān yajñiyā devā nayantu yata āgatāḥ ||

पद पाठ

ये । व॒ध्वः॑ । च॒न्द्रम् । व॒ह॒तुम् । यक्ष्माः॑ । यन्ति॑ । जना॑त् । अनु॑ । पुन॒रिति॑ । तान् । य॒ज्ञियाः॑ । दे॒वाः । नय॑न्तु । यतः॑ । आऽग॑ताः ॥ १०.८५.३१

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:31 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:31


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ये यक्ष्माः) जो रोग (वध्वः) वधू के (चन्द्रं वहतुम्) आह्लादक वोढा-पति (जनात्-अनु यन्ति) जनन-उत्पन्न करनेवाले वंश से प्राप्त होते हैं (यज्ञियाः-देवाः) यज्ञसम्पादक विद्वान्-यज्ञ से चिकित्सा करनेवाले (पुनः-तान् नयन्तु) फिर उन रोगों का शमन करें (यतः-आगताः) जिस दोष से आये हैं, उस दोष को यज्ञ से नष्ट करें ॥३१॥
भावार्थभाषाः - वधू के वोढा पति को जो रोग वंश से प्राप्त हो जाते हैं, उनको यज्ञविधि से चिकित्सा करनेवाले शान्त करें और उसके बीजरूप दोष का भी शमन करें ॥३१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नीरोगता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में उल्लेख था कि पति पत्नी के प्रति आसक्त होकर भोग-प्रधान जीवनवाला न बन जाये। भोग-प्रधान जीवन से रोगों के आ जाने की आशंका है। सो कहते हैं कि (वध्वः) = इस वधू के (चन्द्रं वहतुम्) = इस आह्लादमय वैवाहिक जीवन में ये (यक्ष्माः) = जो रोग (जनात्) = इस पति से (अनुयन्ति) = अनुक्रमेण आ जाते हैं, (यज्ञियाः देवाः) = आदर के योग्य, घरों में समय-समय पर आनेवाले अतिथि (तान्) = उन बातों को (पुनः) = फिर (नयन्तु) = दूर ले जायें (यतः आगताः) = जिन कारणों से ये रोग आये थे। [२] विद्वान् अतिथि आकर उन व्यवहारों को ज्ञानोपदेश से दूर करने का प्रयत्न करें, जिन कारणों से कि रोग आ जाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-विद्वान् अतिथि ही यज्ञिय देव हैं। ये समय-समय पर घरों में आकर ज्ञानोपदेश से हमारे जीवनों को नीरोग बनाते हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ये यक्ष्माः) ये रोगाः (वध्वः-चन्द्रं वहतुम्) कन्याया आह्लादकारकं वोढारं वरं पतिम् “वहतुं वोढारम्” [ऋ० ४।५८।९ दयानन्दः] (जनात्-अनु यन्ति) जननकुलाद्वंशादनुप्राप्नुवन्ति (यज्ञियाः-देवाः) यज्ञसम्पादिनो विद्वांसः “यज्ञियाः यज्ञसम्पादिनः” [निरु० ९।२७] यज्ञेन चिकित्सां कुर्वाणाः (पुनः-तान् नयन्तु) तान् रोगान् शमयन्तु (यतः-आगताः) यतो हि दोषादागतास्तं दोषं यज्ञेन नाशयन्तु ॥३१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Those consumptive ailments which afflict the health and handsomeness of the husband or the beauty and fertility of the wife from birth, let the sages and brilliant specialists of yajna treat and cure upto the source whence, otherwise, they may come and afflict again.