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परा॑ देहि शामु॒ल्यं॑ ब्र॒ह्मभ्यो॒ वि भ॑जा॒ वसु॑ । कृ॒त्यैषा प॒द्वती॑ भू॒त्व्या जा॒या वि॑शते॒ पति॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

parā dehi śāmulyam brahmabhyo vi bhajā vasu | kṛtyaiṣā padvatī bhūtvy ā jāyā viśate patim ||

पद पाठ

परा॑ । दे॒हि॒ । शा॒मु॒ल्य॑म् । ब्र॒ह्मऽभ्यः॑ । वि । भ॒ज॒ । वसु॑ । कृ॒त्या । ए॒षा । प॒त्ऽवती॑ । भू॒त्वी । आ । जा॒या । वि॒श॒ते॒ । पति॑म् ॥ १०.८५.२९

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:29 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:25» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:29


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शामुल्यम्) शमल का कर्म-अशुद्ध कर्म (परा देहि) रजोवस्त्र परे फेंक (ब्रह्मभ्यः-वसु विभज) विद्वानों के लिये धन विशेषरूप से श्रद्धा से दे, या विद्वानों से ज्ञानधन विशेषरूप से सेवन कर, शरीर मन से पवित्र हो (एषा कृत्या) इस क्रिया से (पद्वती) फलवती-गर्भवती (जाया भूत्वी) पुत्रजननयोग्य होकर (पतिम्-आ विशते) पति को भलीभाँति प्राप्त करती है ॥२९॥
भावार्थभाषाः - स्त्री रजस्वला होने पर अशुद्धि दूर करे, अशुद्ध वस्त्र त्याग दे, विद्वानों को धन दान करे, उनसे ज्ञान ग्रहण कर एवं शरीर और मन को पवित्र कर गर्भधारण-पुत्रजनन करने योग्य होकर पति का समागम करे ॥२९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गृहपत्नी के चार गुण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] नव विवाहित वधू से कहते हैं कि तू (शामुल्यम्) = [शम, उल्दाहे] ऐसी बातों को जो शान्ति का दहन कर देती हैं (परादेहि) = दूर कर दे। कभी ऐसा वाक्य न बोल जो घर में अशान्ति का कारण बने। [२] तू 'व्यये चामुक्तहस्तया' इस मनु वाक्य के अनुसार व्यय में अमुक्त हस्ता होती हुई भी (ब्रह्मभ्यः) = ज्ञानी ब्राह्मणों के लिये (वसु विभजा) = धन को देनेवाली हो, अर्थात् घर में दान की वृत्ति को नष्ट न होने देना। [३] (एषा) = ऐसी गृहपत्नी ही (कृत्या) = बड़ी क्रियाशील होती हुई (पद्वती) = उत्कृष्ट पाँवोंवाली होती हुई, अर्थात् लेटे न रहनेवाली (भूत्वी) = होकर (जाया) = उत्कृष्ट सन्तान को जन्म देनेवाली (पतिं आविशते) = पति के हृदय में प्रवेश करती है, अर्थात् पति के हृदय में इसके लिये प्रेम उत्पन्न होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पत्नी का पहला गुण यह है कि शान्तिभंग का कोई कार्य न करें। दूसरा यह कि दानवृत्तिवाली हो । तीसरे क्रियाशील हो । चौथे उत्कृष्ट सन्तान को जन्म देनेवाली बने ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शामुल्यं परा देहि) शमलस्य कर्म शामुल्यम् “अकारस्य छान्दस उकारः” अशुद्धकर्म पराक्षिप-रजोवस्त्रं परे त्यज (ब्रह्मभ्यः वसु विभज) विद्वद्भ्यो धनं विशिष्टतया-श्रद्धया देहि यद्वा विद्वत्सकाशात् खलु ज्ञानधनं विशिष्टतया सेवस्व-गृहाण, शरीरेण मनसा च पवित्रा भव (एषा कृत्या पद्वती) एतया कृत्यया-क्रियया ‘तृतीयार्थे प्रथमा छान्दसी’ फलवती-गर्भवती (जाया भूत्वी) पुत्रजननयोग्या भूत्वा (पतिम्-आ विशते) पतिं समन्तात् प्राप्नोति पत्युर्मनसि प्रविष्टा भवति ॥२९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Cast away the sense of sin and impurity, share wealth and knowledge with and from the holy and wise, and when the bride has taken the seven steps to conjugal duty, she joins the husband heart and soul.