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सु॒किं॒शु॒कं श॑ल्म॒लिं वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यवर्णं सु॒वृतं॑ सुच॒क्रम् । आ रो॑ह सूर्ये अ॒मृत॑स्य लो॒कं स्यो॒नं पत्ये॑ वह॒तुं कृ॑णुष्व ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sukiṁśukaṁ śalmaliṁ viśvarūpaṁ hiraṇyavarṇaṁ suvṛtaṁ sucakram | ā roha sūrye amṛtasya lokaṁ syonam patye vahatuṁ kṛṇuṣva ||

पद पाठ

सु॒ऽकिं॒शु॒कम् । श॒ल्म॒लिम् । वि॒श्वऽरू॑पम् । हिर॑ण्यऽवर्णम् । सु॒ऽवृत॑म् । सु॒ऽच॒क्रम् । आ । रो॒ह॒ । सू॒र्ये॒ । अ॒मृत॑स्य । लो॒कम् । स्यो॒नम् । पत्ये॑ । व॒ह॒तुम् । कृ॑णुष्व ॥ १०.८५.२०

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:20 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:20


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्ये) हे तेजस्विनी वधू ! तू (सुकिंशुकं शल्मलिम्) अच्छे प्रकाशक-सुदीप्त मलरहित पवित्र अथवा सुपुष्पित पलाश के समान शोभन शाखावाले शाल्मलि वृक्ष की भाँति (विश्वरूपम्) सारे रूपोंवाले (हिरण्यवर्णम्) सुनहरे रंगवाले (सुवृतं सुचक्रम्) शोभन व्यवहारवाले, अच्छे गमन आगमनवाले, शोभन चक्रवाले गृहस्थरथ (अमृतस्य लोकम्) अमृत के स्थान के समान (स्योनम्) सुखरूप (वहतुम्) विवाहरूप गृहस्थाश्रम को (पत्ये कृणुष्व) पतिप्राप्ति के लिए बना ॥२०॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थाश्रम को प्रकाशमय, पुष्पित पलाश और शाल्मलि के समान सुन्दर पवित्र अमृत के स्थान जैसा सुखमय बनाना गृहिणी का कार्य है। वह ही इसे स्वर्ग बना सकती है ॥२०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पत्नी

पदार्थान्वयभाषाः - [१] पत्नी इस गृहस्थरूप रथ में आरूढ़ हो । 'इस रथ को वह कैसा बनाये' इसका वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे (सूर्ये) = सविता की पुत्रि ! तू (आरोह) = इस गृहस्थ-रथ में आरूढ़ हो । जो रथ (सुकिंशुकम्) = उत्तम प्रकाशवाला है। अर्थात् पत्नी ने भी स्वाध्याय के द्वारा ज्ञान के प्रकाश को उत्तरोत्तर बढ़ाना है। (शल्मलिम्) = [शल्- to agitate] जिस रथ से कम्पित करके मल को अलग कर दिया गया है। ज्ञान से राग-द्वेषरूप मल दूर होते ही हैं। (विश्वरूपम्) = उस सर्वत्र प्रविष्ट प्रभु का जो विरूपण करनेवाला है । अर्थात् सदा प्रभु के ध्यान की वृत्तिवाला पत्नी ने होना है। (हिरण्यवर्णम्) = देदीप्यमान वर्णवाला हो । स्वास्थ्य के कारण यह चमकता हो। (सुवृतम्) = उत्तम वर्जनवाला है। पत्नी ने सदा कर्मों को उत्तम ढंग से करना है। (सुचक्रम्) = यह गृहस्थ रथ उत्तम चक्रवाला है। पत्नी ने इस गृहस्थ में सदा उत्तम कर्मों को करना है। [२] इस प्रकार के गृहस्थ रथ पर आरोहण करती हुई पत्नी से कहते हैं कि तू इस (वहतुम्) = गृहस्थ रथ को (पत्ये) = पति के लिये (अमृतस्य लोकम्) = नीरोगता का स्थान व (स्योनम्) = सुखकर (कृणुष्व) = बना । पत्नी के व्यवहार पर ही इस बात का निर्भर करता है कि घर में नीरोगता व सुख बना रहे। अधिक भोग-प्रवणता का न होना मौलिक बात है और उसके साथ भोजनाच्छादन की व्यवस्था के ठीक होने पर सुख ही सुख बना रहता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पत्नी घर को अमृतता व कल्याण का स्थान बनाये। इसके लिये वह ज्ञान-प्रवण-वासनाओं को दूर फेंकनेवाली, प्रभु स्मरण की वृत्तिवाली स्वस्थ सद्व्यवहारवाली व उत्तम कर्मों में लगी हुई हो ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्ये) हे तेजस्विनि वधु ! त्वं (सुकिंशुकं शल्मलिम्) सुकाशकं सुदीप्तं शन्नमलं नष्टमलं यद्वोपमायां सुपुष्पितं पलाशमिव तथा शोभनशरं शोभनशाखादण्डकं शाल्मलिवृक्षमिव (विश्वरूपम्) सर्वरूपवन्तं (हिरण्यवर्णम्) सुवर्णवर्णकं (सुवृतं सुचक्रम्) शोभनवर्तनम्-शोभनगमनागमनवन्तं शोभनचक्रवन्तं गृहस्थरथम् (अमृतस्य लोकम्) अमृतस्य स्थानमिव (स्योनम्) सुखरूपं (वहतुम्) विवाहं गृहस्थाश्रमं (पत्ये कृणुष्व) पत्ये-वराय कुरु-सम्पादय ॥२०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Welcome, O bride, bright dawn of a new morning, ride and rule the golden, well structured, well geared chariot of a homely world, beautiful and glowing like a shalmali garden in bloom and turn it into paradisal bliss of immortal joy for the husband and the family.