प्रथम चक्र व पिछले दो चक्र
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सूर्ये! (ते) = तेरे विषय में द्वेचक्रे लगनेवाले दो चक्रों [चक्करों] को तो (ब्रह्माण:) = सर्वज्ञानी पुरुष (ऋतुथा) = उस-उस समय के अनुसार (विदः) = जानते ही हैं। दहेज [बहुत] के लेने के लिये आनेवाला चक्र और विवाह के लिये आनेवाला चक्र तो सबको पता लगता ही है । [२] (अथ) = परन्तु (एकं चक्रम्) = पहला चक्र, जब कि वरपक्षवाले पूछताछ के लिये अपने किसी मित्र के यहाँ आकर ठहरे, (यद् गुहा) = जो चक्र संवृत-सा है [गुह संवरणे] (तद्) = उस चक्र को तो (अद्धातयः) = उस चक्र के ज्ञाता (इत्) = ही, अर्थात् उस चक्र में हिस्सा लेनेवाले ही (विदुः) = जानते हैं। उस समय वर के माता-पिता व उनके वे मित्र, जिनके कि यहाँ आकर प्रथम चक्र में वे ठहरे, वे ही इस चक्र के विषय में जानते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - विवाह प्रसंग में सर्वप्रथम जानकारी के लिये लगाया गया चक्र गुप्त ही होता है । दहेज व विवाह के लिये लगनेवाले चक्र तो सब कोई जानते ही हैं।