वांछित मन्त्र चुनें
736 बार पढ़ा गया

यदया॑तं शुभस्पती वरे॒यं सू॒र्यामुप॑ । क्वैकं॑ च॒क्रं वा॑मासी॒त्क्व॑ दे॒ष्ट्राय॑ तस्थथुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad ayātaṁ śubhas patī vareyaṁ sūryām upa | kvaikaṁ cakraṁ vām āsīt kva deṣṭrāya tasthathuḥ ||

पद पाठ

यत् । अया॑तम् । शु॒भः॒ । प॒ती॒ इति॑ । व॒रे॒ऽयम् । सू॒र्याम् । उप॑ । क्व॑ । एक॑म् । च॒क्रम् । वा॒म् । आ॒सी॒त् । क्व॑ । दे॒ष्ट्राय॑ । त॒स्थ॒थुः॒ ॥ १०.८५.१५

736 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:15 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:22» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:15


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्याम्) तेजस्वी कन्या (वरे-यम्) यह वर (शुभस्पती) परस्पर सौभाग्य के पालक (यत्) जब (उप-अयातम्) तुम परस्पर प्राप्त होते हो, तब (वाम्) तुम दोनों का (एकं-चक्रम्-क्व-आसीत्) एक चक्र सङ्कल्प कहाँ स्थित है (देष्ट्राय) तुम परस्पर स्वात्मदान के लिये (क्व तस्थथुः) कहाँ ठहरते हो ॥१५॥
भावार्थभाषाः - वर वधू का गृहाश्रम के लिये दोनों का मनोभाव या सङ्कल्प किस ओर है, किस विषय में है, तथा परस्पर आत्मदान किस लक्ष्य में है। अर्थात् किसी एक सङ्कल्प या किसी एक लक्ष्य को लेकर विवाह होना चाहिए ॥१५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सम्बन्ध पक्का करानेवाले 'मूल पुरुष'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यद्) = जब शुभस्पती सब शुभ कर्मों का रक्षण करनेवाले युवक के माता-पिता (सूर्यां वरेयम्) = सूर्या के वरण के लिये (उप अयातम्) = यहाँ समीप प्राप्त हुए तो (वाम्) = आप दोनों का एक (चक्रम्) = यह पहला चक्र [चक्कर] (क्व) = कहाँ हुआ था ? आप पहले यहाँ आकर कहाँ ठहरे थे । (देष्ट्राय) = सूर्या के विषय में विविध निर्देशों को पाने के लिये (क्व तस्थथुः) - आप किनके यहां ठहरे। [२] यह प्रश्न विवाह में उपस्थित सब देव [सज्जन] वर के माता-पिता से पूछते हैं। उन्हें उत्कण्ठा होती है कि इस सम्बन्ध को करवाने में किन सज्जन का मुख्य स्थान है ! इन्होंने किन से आकर सूर्या के विषय में विविध जानकारी प्राप्त की ? कोई न कोई व्यक्ति इस प्रकार माध्यम बनता ही है। सूर्या के ग्राम का कोई ऐसा व्यक्ति जो वरपक्ष के माता-पिता का भी परिचित होता है, वही इस कार्य को ठीक से सम्पन्न कर पाता है। सब से पूर्व करके माता-पिता आकर इन्हीं के पास ठहरते हैं। इनके आने का उस समय सामान्यतः औरों को पता नहीं लगता । यह पूछताछ का कार्य गुप्तरूप से ही कर लेना ठीक समझा जाता है। इसके बाद में होनेवाले चक्र [चक्कर] तो सब के ज्ञान का विषय बनेंगे ही। जब विवाह के समय वरात में सब देव [सज्जन] आते हैं, तो उनकी यह जानने की इच्छा स्वाभाविक होती है कि 'पहले-पहले आपको किनसे सब बातों की जानकारी हुई' ? बस यही प्रश्न प्रस्तुत मन्त्र का विषय है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - विवाह में उपस्थित होने पर सब देव उन सज्जन के विषय में वर के माता-पिता से पूछते हैं कि 'आप पहले पहल आकर कहाँ ठहरे। किनसे आपको सब बातों का ज्ञान हुआ' ?

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्याम्) सूर्या ‘प्रथमार्थे द्वितीया छान्दसी’ तेजस्विनी कन्या (वरे-यम्) ‘वरोऽयम्, वरः-अयम्’ सन्धिश्छान्दसः’ ओकारस्थाने-एकारः, अयं वरश्चोभौ (शुभस्पती) परस्परं शुभस्य सौभाग्यस्य पालकौ वधूवरौ (यत्-उप-अयातम्) यदा युवां परस्परमुपगच्छथः, तदा (वाम्-एकं-चक्रम्-क्व-आसीत्) युवयोरेकं चक्रं सङ्कल्परूपं मनोमयं कुत्र स्थितमस्ति (देष्ट्राय क्व तस्थथुः) युवां च परस्परं स्वात्मदानाय कुत्र तिष्ठथः ॥१५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Ashvins, protectors and promoters of life’s good, noble men and women of reason and passion, when you come to the bride, darling choice of the groom, where is one of the wheels of your chariot and where abide the two for the purpose of benediction?