'प्राण- अपान- व्यान' की ठीक स्थिति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पतिं प्रयती) = पतिगृह की ओर जाती हुई (सूर्या मनस्मयं अन:) = सूर्या मन से बने रथ पर, मनोरथ पर (आरोहत्) = आरूढ़ हुई। तो उस समय (यात्याः) = जाती हुई सूर्या के रथ के (ते चक्रे) = वे चक्र (शुची) = वे पवित्र प्राणापान ही थे, और उन प्राणापान रूप चक्रों में (व्यानः) = व्यान (अक्ष:) = अक्ष [ axle ] के रूप में (आहतः) = लगा हुआ था । 'प्राणापानौ पवित्रे' तै० ३।३, ४|४| प्राणापान ही शुचि व पवित्र हैं । ये यदि रथ के पहिये हैं तो कान उन चक्रों का अक्ष है । "भूः ' इति प्राणः, 'भुव:' इति अपान:, 'स्व:' इति व्यानः ' इन ब्राह्मण ग्रन्थों के शब्दों में 'भूः भुवः स्वः ' ही प्राण अपान व व्यान हैं। यही त्रिलोकी है । अध्याय में 'भूः ' शरीर है, 'भुवः' हृदयान्तरिक्ष है, 'स्वः' मस्तिष्करूप द्युलोक है। सूर्या के ये तीनों ही लोक बड़े ठीक हैं। इनको ठीक बना करके वह मनोमय रथ पर आरूढ़ हुई है और पतिगृह की ओर चली है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सूर्या के 'प्राण-अपान-व्यान' ठीक कार्य करनेवाले हैं, अतएव वह पूर्ण स्वस्थ व उल्लासमय मनवाली है।