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अ॒ग्निं विश॑ ईळते॒ मानु॑षी॒र्या अ॒ग्निं मनु॑षो॒ नहु॑षो॒ वि जा॒ताः । अ॒ग्निर्गान्ध॑र्वीं प॒थ्या॑मृ॒तस्या॒ग्नेर्गव्यू॑तिर्घृ॒त आ निष॑त्ता ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agniṁ viśa īḻate mānuṣīr yā agnim manuṣo nahuṣo vi jātāḥ | agnir gāndharvīm pathyām ṛtasyāgner gavyūtir ghṛta ā niṣattā ||

पद पाठ

अ॒ग्निम् । विशः॑ । ई॒ळ॒ते॒ । मानु॑षीः । याः । अ॒ग्निम् । मनु॑षः । नहु॑षः । वि । जा॒ताः । अ॒ग्निः । गान्ध॑र्वीम् । प॒थ्या॑म् । ऋ॒तस्य॑ । अ॒ग्नेः । गव्यू॑तिः । घृ॒ते । आ । निऽस॑त्ता ॥ १०.८०.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:80» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मानुषीः) मनुष्यसम्बन्धी (याः) जो (विशः) प्रजाएँ हैं, वे (अग्निम्) परमात्मा की (ईडते) स्तुति करती हैं (नहुषः-मनुषः-विजाताः) बन्धन दग्ध करनेवाले परम मननशील ऋषि के विशिष्ट उपदेश से प्रसिद्धि को प्राप्त (प्रजाः) प्रजाएँ (अग्निम्) परमात्मा को आश्रित करती हैं (अग्निः) परमात्मा (ऋतस्य पथ्याम्) ज्ञानमय वेद की हितकारी (गान्धर्वीम्) वाणी का उपदेश करता है (अग्नेः) परमात्मा के (गव्यूतिः) जीवनमार्ग की पद्धति (घृते-आनिषत्ता) उसके तेज में भलीभाँति नियत है ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यप्रजाएँ परमात्मा की स्तुति करें, बन्धन के छुड़ानेवाले ऋषि के उपदेश से उत्तम प्रजाएँ बनकर परमात्मा को प्राप्त होती हैं तथा उसकी कल्याणकारी वेदवाणी जीवनमार्ग दर्शाती है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सत्य ज्ञान प्रकाशिका' वेदवाणी

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (या:) = जो (मानुषीः विशः) = विचारशील प्रजाएँ हैं वे अग्निं ईडते उस प्रभु का उपासन करती हैं। इन्हें सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ में, प्रत्येक घटनाचक्र में प्रभु की महिमा दिखती है । हिमाच्छादित पर्वत, समुद्र वा यह पृथिवी सब इन्हें प्रभु का स्तवन करते प्रतीत होते हैं । [२] उस (नहुषः) = सबको एक सूत्र में बाँधनेवाले [नह बन्धने] प्रभु से (विजाता:) = विविधरूपों को लेकर उत्पन्न हुए हुए (मनुषा:) = विचारशील पुरुष (अग्निम्) = उस परमात्मा को ही उपासित करते हैं। उन्हें उस प्रभु का पितृत्व स्मरण होता है। इससे जहाँ वे परस्पर भ्रातृत्व को अनुभव करते हुए प्रेम से चलते हैं, वहाँ विविध रूपों के निर्माण करनेवाले प्रभु के रचना वैचित्र्य को देखकर उसके प्रति नतमस्तक होते हैं। प्रभु को पिता जानकर सब आवश्यक चीजों को उसी से माँगते हैं । [३] (अग्निः) = वे अग्रेणी प्रभु भी (गान्धर्वीम्) = सब ज्ञानवाणियों का धारण करनेवाली (ऋतस्य) = सत्य के (पथ्याम्) = मार्ग में हितकर वेदवाणी को देते हैं । इस वेदवाणी से हमें ज्ञान प्राप्त होता है इसका अध्ययन हमें ऋत के मार्ग में ले चलता है । यह (अग्नेः) = उस अग्रेणी प्रभु का (गव्यूतिः) = मार्ग (घृते) = ज्ञानदीप्ति में (आनिषत्ता) = सर्वथा स्थापित है। प्रभु के मार्ग पर चलनेवाला व्यक्ति अधिकाधिक प्रकाश में पहुँचता जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सब विचारशील व्यक्ति प्रभु का उपासन करते हैं। प्रभु उन्हें ज्ञान देते हैं। ज्ञान ही प्रभु प्राप्ति का मार्ग है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मानुषीः-याः-विशः-अग्निम्-ईडते) मनुष्यसम्बन्धिन्यो याः प्रजाः सन्ति ताः परमात्मानं स्तुवन्ति (नहुषः-मनुषः-विजाताः) बन्धनदग्धुः परममननशीलादृषेर्विशिष्टोपदेशात् प्रसिद्धिं प्राप्ता या प्रजाः (अग्निम्) परमात्मानमाश्रयन्ति (अग्निः) परमात्मा (ऋतस्य पथ्यां गान्धर्वीम्) ज्ञानमयस्य वेदस्य हितकरीं वाचमुपदिशति (अग्नेः-गव्यूतिः-घृते-आनिषत्ता) परमात्मन-स्तेजसि जीवनमार्गपद्धतिः समन्तात् तत्र नियता भवति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Communities of humanity conscious of their humanity and social responsibility worship Agni for guidance. People who rise above their earthly bonds thank and adore Agni. Agni holds and proclaims the holy voice of eternal truth which guides humanity on the paths of rectitude. The path that leads to Agni exists in and radiates from the lustre of Agni itself.