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अ॒ग्निमु॒क्थैॠष॑यो॒ वि ह्व॑यन्ते॒ऽग्निं नरो॒ याम॑नि बाधि॒तास॑: । अ॒ग्निं वयो॑ अ॒न्तरि॑क्षे॒ पत॑न्तो॒ऽग्निः स॒हस्रा॒ परि॑ याति॒ गोना॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agnim ukthair ṛṣayo vi hvayante gniṁ naro yāmani bādhitāsaḥ | agniṁ vayo antarikṣe patanto gniḥ sahasrā pari yāti gonām ||

पद पाठ

अ॒ग्निम् । उ॒क्थैः । ऋष॑यः । वि । ह्व॒य॒न्ते॒ । अ॒ग्निम् । नरः॑ । याम॑नि । बा॒धि॒तासः॑ । अ॒ग्निम् । वयः॑ । अ॒न्तरि॑क्षे । पत॑न्तः । अ॒ग्निः । स॒हस्रा॑ । परि॑ । या॒ति॒ । गोना॑म् ॥ १०.८०.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:80» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋषयः) दर्शनशील उपासकजन (उक्थैः) वेदवचनों तथा स्तुतिवचनों के द्वारा (अग्निम्) परमात्मा को (विह्वयन्ते) विशेषरूप से आमन्त्रित करते हैं (बाधितासः-नरः) कामादि दोषों से पीड़ित जन (यामनि) अवसर पर (अग्निम्) परमात्मा को स्मरण करते हैं (अन्तरिक्षे पतन्तः-वयः-अग्निम्) आकाश में उड़ते हुए पक्षियों की भाँति उन्नतिपथ की ओर जाते हुए परमात्मा की उपासना करते हैं (अग्निः) परमात्मा (गोनां सहस्रा) वेदवाणियों के सहस्र प्रयोजनों को (परियाति) परिप्राप्त कराता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - कामादि दोषों से पीड़ित जन परमात्मा का स्मरण करें, उन्नति की ओर चलनेवाले जन उसकी उपासना करें, परमात्मदर्शन के इच्छुक महानुभाव वेदवचनों से उस का आमन्त्रण करें, इस प्रकार उन के सहस्रगुणित प्रयोजनों को परमात्मा प्राप्त कराता है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञानी भक्त व आर्त-भक्त

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋषयः) = तत्त्वज्ञानी पुरुष (उक्थैः) = स्तोत्रों से (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु को (विह्वयन्ते) = विशेषरूप से पुकारते हैं । तत्त्वद्रष्टा पुरुष सर्वत्र प्रभु की महिमा को देखता है और प्रभु का स्तवन करता है। (नरः) = अन्य मनुष्य भी (अग्निम्) = प्रभु का उपासन करते हैं । परन्तु प्रायः करते तभी हैं जब कि (यामनि) = जीवनयात्रा के मार्ग में (बाधितास:) = पीड़ित होते हैं। ऋषि प्रभु के ज्ञानी भक्त बनते हैं, तो सामान्य मनुष्य प्रभु के आर्त भक्त होते हैं । [२] (अन्तरिक्षे पतन्तः) = अन्तरिक्ष में उड़ान करते हुए (वयः) = पक्षी भी (अग्निम्) = उस परमात्मा को ही स्तुत कर रहे हैं, इनकी उड़ान में भी तत्त्वद्रष्टा को प्रभु की महिमा दिखती है। 'किस प्रकार चील नि:शब्द होकर पंखों को न हिलाती हुई-सी आकाश में फिसलती-सी चली जाती है' यह देखकर किसे आश्चर्य नहीं होता ! [३] (अग्निः) = वह प्रभु ही (गोनां सहस्रा) = इन इन्द्रियों की हजारों वृत्तियों के (परियाति) = चारों ओर प्राप्त होते हैं, अर्थात् इन्द्रियवृत्तियों को प्रभु ही एक देश में बाँधनेवाले होते हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारी इन्द्रियवृत्तियाँ भटकें नहीं तो सर्वोत्तम साधन यही है कि हम प्रभु-चरण सेवा में उपस्थित हों । प्रभु चरण सेवा का व्यसन लगने पर अन्य व्यसन स्वयमेव समाप्त हो जाएगा। उड़ते हुए पक्षियों की उड़ान में भी प्रभु महिमा को देखनेवाला व्यक्ति इन्द्रियवृत्तियों को भटकने से बचाने में क्यों न समर्थ होगा ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम पीड़ा के ही समय प्रभु का स्मरण न करें, प्रभु के ज्ञानी भक्त बनें। प्रभु हमारी इन्द्रियवृत्तियों को भटकने से रोकेंगे।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋषयः-उक्थैः-अग्निं विह्वयन्ते) दर्शनशीला उपासकाः वेदवचनैः परमात्मानं विशिष्टतया आमन्त्रयन्ते (बाधितासः-नरः-अग्निं यामनि) कामादिदोषैर्बाधिता जना अवसरे परमात्मानं स्मरन्ति (अन्तरिक्षे पतन्तः-वयः-अग्निम्) अन्तरिक्षे गच्छन्तः पक्षिण इव उन्नतिपथगा जना उपासन्ते (अग्निः-गोनां सहस्रा परियाति) परमात्मा वेदवाचां सहस्राणि प्रयोजनानि परिप्रापयति “अन्तर्गतणिजर्थः” ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Seers invoke Agni with the chant of sacred hymns. People in crisis on the journey onward call on Agni for help and guidance. Like birds flying up in the sky, sages on the way higher up towards the heavens or deep in awareness in the mind adore Agni. Agni, indeed, pervades and transcends a thousand abodes of light and life and inspires and enlightens the souls that seek and find.