पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋषयः) = तत्त्वज्ञानी पुरुष (उक्थैः) = स्तोत्रों से (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु को (विह्वयन्ते) = विशेषरूप से पुकारते हैं । तत्त्वद्रष्टा पुरुष सर्वत्र प्रभु की महिमा को देखता है और प्रभु का स्तवन करता है। (नरः) = अन्य मनुष्य भी (अग्निम्) = प्रभु का उपासन करते हैं । परन्तु प्रायः करते तभी हैं जब कि (यामनि) = जीवनयात्रा के मार्ग में (बाधितास:) = पीड़ित होते हैं। ऋषि प्रभु के ज्ञानी भक्त बनते हैं, तो सामान्य मनुष्य प्रभु के आर्त भक्त होते हैं । [२] (अन्तरिक्षे पतन्तः) = अन्तरिक्ष में उड़ान करते हुए (वयः) = पक्षी भी (अग्निम्) = उस परमात्मा को ही स्तुत कर रहे हैं, इनकी उड़ान में भी तत्त्वद्रष्टा को प्रभु की महिमा दिखती है। 'किस प्रकार चील नि:शब्द होकर पंखों को न हिलाती हुई-सी आकाश में फिसलती-सी चली जाती है' यह देखकर किसे आश्चर्य नहीं होता ! [३] (अग्निः) = वह प्रभु ही (गोनां सहस्रा) = इन इन्द्रियों की हजारों वृत्तियों के (परियाति) = चारों ओर प्राप्त होते हैं, अर्थात् इन्द्रियवृत्तियों को प्रभु ही एक देश में बाँधनेवाले होते हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारी इन्द्रियवृत्तियाँ भटकें नहीं तो सर्वोत्तम साधन यही है कि हम प्रभु-चरण सेवा में उपस्थित हों । प्रभु चरण सेवा का व्यसन लगने पर अन्य व्यसन स्वयमेव समाप्त हो जाएगा। उड़ते हुए पक्षियों की उड़ान में भी प्रभु महिमा को देखनेवाला व्यक्ति इन्द्रियवृत्तियों को भटकने से बचाने में क्यों न समर्थ होगा ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम पीड़ा के ही समय प्रभु का स्मरण न करें, प्रभु के ज्ञानी भक्त बनें। प्रभु हमारी इन्द्रियवृत्तियों को भटकने से रोकेंगे।