पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वीरपेशा:) = उपासकों को वीर बनानेवाला [पेशस् = form] (अग्निः) = अग्रेणी प्रभु (द्रविणं दात्) = उपासकों के लिये जीवनयात्रा के लिये आवश्यक धन को देता है और (यः) = जो (सहस्रा सनोति) = इन सहस्र संख्याक धनों का दान करता है उसे (अग्निः) = वे प्रभु (ऋषिम्) = ऋषि व तत्त्वद्रष्टा बनाते हैं । प्रभु धन देते हैं, देते वे इसलिए हैं कि इस धन से हम लोकहित के कार्य कर सकें । इन धनों का विनियोग हमें अपने महलों को खड़ा करने में नहीं करना है। इस धन को न देकर जो इसे स्वयं लादे रखता है वह अल्पज्ञ है। धन पर हम आरूढ़ हों, यह हमारे पर आरूढ़ न हो जाए। [२] (अग्निः) = वे प्रभु (हव्यम्) = हमारे से दिये गये हव्य पदार्थों को (दिवि) = सम्पूर्ण द्युलोक में (अततान) = विस्तृत कर देते हैं। यह भी प्रभु की अद्भुत महिमा है कि उन्होंने इस भौतिक अग्नि में वह छेदक-भेदक शक्ति रखी है कि इसमें डाले गये हव्य पदार्थों को वह अत्यन्त सूक्ष्म अदृश्य से कणों में विभक्त करके सारे वायुमण्डल में फैला देता है। [३] (अग्नेः) = उस अग्रेणी प्रभु के (धामानि) = तेज (पुरुत्रा) = बहुत स्थानों में (विभृता) = विविधरूपों में भृत हुए हैं। सूर्य-चन्द्रमा में ये 'प्रभा' के रूप से हैं, अग्नि में ज्योति के रूप में हैं। वायु में गति रूप में हैं तो पृथिवी में दृढ़ता के रूप में हैं। तेजस्वियों में ये तेजरूप से हैं, बलवानों में बल के रूप में तथा बुद्धिमानों में बुद्धि के रूप में ये विद्यमान हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही सब ऐश्वर्यों को देते हैं। अग्नि आदि में प्रभु ने ही अद्भुत भेदक शक्ति को रखा है और सर्वत्र प्रभु के तेज ही पिण्डों को विभूतिमय बना रहे हैं ।