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अ॒ग्निर्दा॒द्द्रवि॑णं वी॒रपे॑शा अ॒ग्निॠषिं॒ यः स॒हस्रा॑ स॒नोति॑ । अ॒ग्निर्दि॒वि ह॒व्यमा त॑ताना॒ग्नेर्धामा॑नि॒ विभृ॑ता पुरु॒त्रा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agnir dād draviṇaṁ vīrapeśā agnir ṛṣiṁ yaḥ sahasrā sanoti | agnir divi havyam ā tatānāgner dhāmāni vibhṛtā purutrā ||

पद पाठ

अ॒ग्निः । दा॒त् । द्रवि॑णम् । वी॒रऽपे॑शाः । अ॒ग्निः । ऋषि॑म् । यः । स॒हस्रा॑ । स॒नोति॑ । अ॒ग्निः । दि॒वि । ह॒व्यम् । आ । त॒ता॒न॒ । अ॒ग्नेः । धामा॑नि । विऽभृ॑ता । पु॒रु॒ऽत्रा ॥ १०.८०.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:80» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वीरपेशाः-अग्निः-ह) वीरस्वरूप परमात्मा निश्चय (ऋषिं द्रविणं दात्) अपने द्रष्टा के लिए मौक्षैश्वर्य देता है (यः सहस्रा सनोति) जो बहुत स्तुतिवचनों को उसके लिए समर्पित करता है (अग्निः) परमात्मा (दिवि) मोक्षधाम में (हव्यं आततान) स्तुतिवचनों का विस्तार करता है (अग्नेः-धामानि) परमात्मा के व्याप्त धाम (पुरुत्रा विभृता) बहुत नियत हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अपने द्रष्टा-दर्शन के इच्छुक के लिए मौक्षैश्वर्य देता है, जो उसके लिए बहुत सुखी वचनों को समर्पित करता है, उन स्तुतियों का विस्तृत फल मोक्षप्राप्ति है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'वीरपेशा अग्नि'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वीरपेशा:) = उपासकों को वीर बनानेवाला [पेशस् = form] (अग्निः) = अग्रेणी प्रभु (द्रविणं दात्) = उपासकों के लिये जीवनयात्रा के लिये आवश्यक धन को देता है और (यः) = जो (सहस्रा सनोति) = इन सहस्र संख्याक धनों का दान करता है उसे (अग्निः) = वे प्रभु (ऋषिम्) = ऋषि व तत्त्वद्रष्टा बनाते हैं । प्रभु धन देते हैं, देते वे इसलिए हैं कि इस धन से हम लोकहित के कार्य कर सकें । इन धनों का विनियोग हमें अपने महलों को खड़ा करने में नहीं करना है। इस धन को न देकर जो इसे स्वयं लादे रखता है वह अल्पज्ञ है। धन पर हम आरूढ़ हों, यह हमारे पर आरूढ़ न हो जाए। [२] (अग्निः) = वे प्रभु (हव्यम्) = हमारे से दिये गये हव्य पदार्थों को (दिवि) = सम्पूर्ण द्युलोक में (अततान) = विस्तृत कर देते हैं। यह भी प्रभु की अद्भुत महिमा है कि उन्होंने इस भौतिक अग्नि में वह छेदक-भेदक शक्ति रखी है कि इसमें डाले गये हव्य पदार्थों को वह अत्यन्त सूक्ष्म अदृश्य से कणों में विभक्त करके सारे वायुमण्डल में फैला देता है। [३] (अग्नेः) = उस अग्रेणी प्रभु के (धामानि) = तेज (पुरुत्रा) = बहुत स्थानों में (विभृता) = विविधरूपों में भृत हुए हैं। सूर्य-चन्द्रमा में ये 'प्रभा' के रूप से हैं, अग्नि में ज्योति के रूप में हैं। वायु में गति रूप में हैं तो पृथिवी में दृढ़ता के रूप में हैं। तेजस्वियों में ये तेजरूप से हैं, बलवानों में बल के रूप में तथा बुद्धिमानों में बुद्धि के रूप में ये विद्यमान हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही सब ऐश्वर्यों को देते हैं। अग्नि आदि में प्रभु ने ही अद्भुत भेदक शक्ति को रखा है और सर्वत्र प्रभु के तेज ही पिण्डों को विभूतिमय बना रहे हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वीरपेशाः-अग्निः-ह) वीरस्वरूपः परमात्मा निश्चयेन (द्रविणं ऋषिं दात्) मोक्षैश्वर्यम्-ऋषये “विभक्तिव्यत्ययेन-चतुर्थीस्थानी द्वितीया” स्वकीये द्रष्ट्रे ददाति (यः सहस्रा सनोति) यो बहूनि स्तुतिवचनानि तस्मै परमात्मने प्रयच्छति (अग्निः) परमात्मा (दिवि हव्यं आततान) ऋषिणा दातव्यं स्तुतिवचनं मोक्षधामनि विस्तारयति (अग्नेः-धामानि पुरुत्रा विभृता) परमात्मनो व्याप्तानि स्थानानि बहुत्र धृतानि सन्ति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, heroic in form and pride of the brave, gives wealth, honour and excellence and all that is valuable in the world. Agni rewards the sage, seer and visionary scholar a thousand ways. Agni raises and diffuses the fragrance of oblations to the heavens. Indeed the presence and pervasions of Agni are boundless, infinitely spread out.