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अ॒ग्नेरप्न॑सः स॒मिद॑स्तु भ॒द्राग्निर्म॒ही रोद॑सी॒ आ वि॑वेश । अ॒ग्निरेकं॑ चोदयत्स॒मत्स्व॒ग्निर्वृ॒त्राणि॑ दयते पु॒रूणि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agner apnasaḥ samid astu bhadrāgnir mahī rodasī ā viveśa | agnir ekaṁ codayat samatsv agnir vṛtrāṇi dayate purūṇi ||

पद पाठ

अ॒ग्नेः । अप्न॑सः । स॒म्ऽइत् । अ॒स्तु॒ । भ॒द्रा । अ॒ग्निः । म॒ही इति॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । आ । वि॒वे॒श॒ । अ॒ग्निः । एक॑म् । चो॒द॒य॒त् । स॒मत्ऽसु॑ । अ॒ग्निः । वृ॒त्राणि॑ । द॒य॒ते॒ । पु॒रूणि॑ ॥ १०.८०.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:80» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अप्नसः-अग्नेः) संसार की रचना और जीवों के लिए कर्मफल प्रदान करना कर्म जिस का है, ऐसे परमात्मा की (समित्-भद्रा-अस्तु) भेंट पवित्र स्तुति है (अग्निः) परमात्मा (मही-रोदसी) महान् द्युलोक पृथिवी लोक को (आविवेश) आविष्ट प्रविष्ट है (अग्निः) वह अग्रणायक परमात्मा आग्नेयास्त्रवेत्ता की भान्ति (एकं-समत्सु चोदयत्) अकेले को भी संग्रामों में प्रेरणा करता है-बल प्रदान करता है (अग्निः) परमात्मा (पुरुणि-वृत्राणि) बहुत पापों या घेरनेवाले शत्रुदलों को (दयते) नष्ट करता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - संसार के रचयिता तथा जीवों के कर्मफलप्रदाता की भेंट भौतिक वस्तु नहीं है, किन्तु आत्मभावभरी स्तुति है, वह द्यावापृथिवीमय जगत् में व्यापक है, वह अकेले मनुष्य को भी विरोधियों को दबाने के लिए बल प्रदान करता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

बाह्य व अन्तः संग्रामों में विजय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अप्नस:) = सब कर्मों को करनेवाले [कर्मवतः सा० ] (अग्नेः) = उस अग्रेणी प्रभु की (समिद्) = दीप्त-हदय में प्रकाश, (भद्रा अस्तु) = हमारा कल्याण व सुख करनेवाला हो । अर्थात् हमारे हृदयों में उस प्रभु का प्रकाश हो। इस प्रभु की शक्ति से ही होते हुए सब कर्मों को हम जानें। हमें उन कर्मों का गर्व न हो। हम यह अनुभव करने का प्रयत्न करें कि वह (अग्निः) = परमात्मा ही (मही रोदसी) = इन महान् द्युलोक से पृथिवीलोक तक सब पिण्डों में (अविवेश) = प्रविष्ट हो रहे हैं। उस-उस लोक में प्रभु के अंश से ही 'विभूति श्री व ऊर्ज्' का दर्शन होता है। इस अग्नि में तेज वे प्रभु ही हैं, सूर्य व चन्द्र की कान्ति भी वे ही हैं । [२] (अग्निः) = वे प्रभु ही (एकम्) = एक स्वभक्त क्षत्रिय को (समत्सु) = संग्रामों में (चोदयत्) = प्रेरणा देते हैं, उसके सहायक बनकर उसे संग्राम में विजीय करते हैं। (अग्निः) = ये प्रभु ही (पुरूणि) = बहुत संख्यावाले (वृत्राणि) = ज्ञान पर आवरण के रूप आ जानेवाले वासनारूप शत्रुओं को (दयते) = हिंसित करते हैं। बाह्य संग्रामों में भी विजय प्रभु ही प्राप्त कराते हैं, अन्तः संग्रामों में भी। इन विजयों के द्वारा ही वे हमारा कल्याण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हृदयों में प्रभु का ध्यान हमें शक्ति देता है और बाह्य व अन्तः तः संग्रामों में विजयी बनाता है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अप्नसः-अग्नेः समित्-भद्रा अस्तु) कर्मवतः-संसाररचनं जीवेभ्यः कर्मफलप्रदानं कर्म यस्य तथाभूतस्य परमात्मनः समित्-अपहृतिः पवित्राः स्तुतिर्भवतु (अग्निः-मही-रोदसी-आविवेश) परमात्मा महत्यौ द्यावापृथिव्यौ समन्तादाविशति प्रविष्टोऽस्ति (अग्निः) स अग्रणायकः परमात्मा आग्नेयास्त्रवेत्तेव (एकं समत्सु चोदयत्) एकाकिनमपि सङ्ग्रामेषु प्रेरयति बलं प्रयच्छति (अग्निः पुरुणि वृत्राणि दयते) परमात्मा बहूनि पापानि आवरकाणि शत्रुवृन्दानि नाशयति “दयते-दयमानो शत्रून् इति हिंसाकर्मा” [निरु० ४।१७] ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the full fire, heat and light of Agni, versatile power of action be good for universal well being, Agni which pervades both heaven and earth. Agni inspires and energises every one in the battles of life, and Agni dispels and destroys all evils of want and darkness.