बाह्य व अन्तः संग्रामों में विजय
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अप्नस:) = सब कर्मों को करनेवाले [कर्मवतः सा० ] (अग्नेः) = उस अग्रेणी प्रभु की (समिद्) = दीप्त-हदय में प्रकाश, (भद्रा अस्तु) = हमारा कल्याण व सुख करनेवाला हो । अर्थात् हमारे हृदयों में उस प्रभु का प्रकाश हो। इस प्रभु की शक्ति से ही होते हुए सब कर्मों को हम जानें। हमें उन कर्मों का गर्व न हो। हम यह अनुभव करने का प्रयत्न करें कि वह (अग्निः) = परमात्मा ही (मही रोदसी) = इन महान् द्युलोक से पृथिवीलोक तक सब पिण्डों में (अविवेश) = प्रविष्ट हो रहे हैं। उस-उस लोक में प्रभु के अंश से ही 'विभूति श्री व ऊर्ज्' का दर्शन होता है। इस अग्नि में तेज वे प्रभु ही हैं, सूर्य व चन्द्र की कान्ति भी वे ही हैं । [२] (अग्निः) = वे प्रभु ही (एकम्) = एक स्वभक्त क्षत्रिय को (समत्सु) = संग्रामों में (चोदयत्) = प्रेरणा देते हैं, उसके सहायक बनकर उसे संग्राम में विजीय करते हैं। (अग्निः) = ये प्रभु ही (पुरूणि) = बहुत संख्यावाले (वृत्राणि) = ज्ञान पर आवरण के रूप आ जानेवाले वासनारूप शत्रुओं को (दयते) = हिंसित करते हैं। बाह्य संग्रामों में भी विजय प्रभु ही प्राप्त कराते हैं, अन्तः संग्रामों में भी। इन विजयों के द्वारा ही वे हमारा कल्याण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हृदयों में प्रभु का ध्यान हमें शक्ति देता है और बाह्य व अन्तः तः संग्रामों में विजयी बनाता है ।