पदार्थान्वयभाषाः - हे प्रभो! आप हमारे जीवनों में (यज्ञस्य) = यज्ञात्मक कर्मों का तथा (रजसः) = क्रियाशीलता का [रजः कर्मणि] नेता (भुवः) = प्रणयन करनेवाले होते हैं, (यत्रा) = इन यज्ञात्मक कर्मों के निमित्त ही (शिवाभिः) = कल्याणकर (नियुद्भिः) = इन्द्रियाश्वों से हमें (सचसे समवेत) = युक्त करते हैं। प्रभु हमें शुभ कर्मों की ओर झुकाव वाली इन्द्रियों को प्राप्त कराते हैं । 'हम अशुभ कर्मों में न प्रवृत्त हों' इसी उद्देश्य से (मूर्धानम्) = हमारे मस्तिष्क को दिवि प्रकाश में (दधिषे) = हे प्रभो ! आप स्थापित करते हो। हमें प्रभु ज्ञान देते हैं, जिससे कि हमारे कर्मों की पवित्रता बनी रहे । हे अग्ने अग्रेणी प्रभो ! आप हमारी (जिह्वाम्) = जिह्वा को (स्वर्षाम्) = प्रकाशमय प्रभु का सेवन करनेवाली उस ज्ञान ज्योति के पुञ्ज प्रभु का नामोच्चारण करनेवाली तथा (हव्यवाहम्) = हव्य पदार्थों का ही सेवन करनेवाली (चकृषे) = करते हैं । हमारी जिह्वा ज्ञान के शब्दों व प्रभु के नामों का ही उच्चारण करती है और पवित्र यज्ञशेष का ही सेवन करती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ — [क] हम क्रियाशील हों और यज्ञों में लगे रहें, [ख] इन्द्रियों को शुभ बनाएँ, [ग] ज्ञान को धारण करे, [घ] प्रभु नामोच्चारण करें और हव्य पदार्थों का ही सेवन करें।