ऋत का रक्षण [सप्तपदी की व्याख्या]
पदार्थान्वयभाषाः - गत मन्त्र के अनुसार जब हम अपने शरीरों में प्रभु की अभिव्यक्ति कराते हैं तो हे प्रभो ! आप हमारे लिये (महः चक्षुः) = तेजस्विता से परिपूर्ण चक्षु होते हैं । अथवा प्रभु हमें तेजस्वी भी बनाते हैं और हमारे लिए मार्गदर्शक भी होते हैं, हमें कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान देते हैं। कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान देकर वे (ऋतस्य गोपाः) = ऋत के रक्षक होते हैं। हमारे जीवनों में से अमृत को दूर करके ऋत को परिपुष्ट करते हैं। इस प्रकार (यत्) = जब आप (ऋताय वेषि) = हमारे में ऋत के लिये, ऋत की स्थापना के लिये कामना करते हैं तो (वरुणः भुवः) = द्वेष का निवारण करनेवाले होते हैं । इस द्वेष निवारण के लिये (अपाम्) = [आपः रेतो भूत्वा] रेतःकणों के (न पात्) = न गिरने देनेवाले होते हैं। सुरक्षित वीर्य वाला शूर-वीर पुरुष ही द्वेषादि से ऊपर उठ पाता है। हे प्रभो ! इस द्वेष निवारण के लिये ही उस व्यक्ति के लिये (जातवेदः भुवः) = [ जातं वेदो यस्यात्] उचित धन को प्राप्त करानेवाले होते हैं [वेद: - wealth] । निर्धनता भी कई अशुभ भावनाओं को जन्म देने का कारण बन जाती है। हे प्रभो ! आप (यस्य हव्यं जुजोषः) = जिसके हव्य को सेवन करनेवाले होते हैं उसके लिये (दूतः) = ज्ञान के सन्देश को प्राप्त करानेवाले होते हैं। वस्तुतः एक प्रभु भक्त धन को प्राप्त करके हव्य का सेवन करता है, त्यागपूर्वक यज्ञशेष का ही उपयोग करता है। यह यज्ञशेष का सेवन ही प्रभु का उपासन है 'हविषा विधेम ' उस आनन्द स्वरूप प्रभु का हवि के द्वारा उपासन करते हैं। इन यज्ञशेष का सेवन करने वालों को ही प्रभु का ज्ञान सन्देश प्राप्त होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमारे मार्गदर्शक हैं, हमारे जीवन को ऋतमय वीरतापूर्ण व यज्ञशेष का सेवन करनेवाला बनाते हैं ।
अन्य संदर्भ: सूचना- पिछले मन्त्र के 'सात पदों' का भी प्रस्तुत मन्त्र में संकेत प्रतीत होता है- [१] भुवः चक्षुर्महः = तेजिस्वतापूर्ण ज्ञान, [२] ऋतस्य गोपाः ऋत का, यज्ञ का रक्षण, [३] भुवोवरुणः - द्वेष निवारण, [४] अपांनपात्-वीर्यरक्षण, [५] जातवेदः - उचित धनार्जन, [६] दूतः - ज्ञान सन्देश श्रवण, [७] हव्यं जुजोष: यज्ञशेष के सेवन से प्रभु का आराधन ।