पदार्थान्वयभाषाः - हे (वसो) = अपने निवास को उत्तम बनानेवाले जीव ! तू (हि) = निश्चय से (उष उषः) = प्रत्येक उष:काल में (अग्रम् एषि) = आगे और आगे बढ़ता है। (त्वं) = तू (यमयोः) = परस्पर अवियुक्त-युग्मरूप से रहनेवाले दिन-रात में (विभावा) = विशिष्ट दीप्ति वाला (अभवः) = होता है । गत मन्त्र के अनुसार यह शरीर व मस्तिष्क की उन्नति के शिखर पर पहुँचने का प्रयत्न करता है, सो यह स्वास्थ्य के कारण दीप्त शरीर वाला तथा ज्ञान के कारण दीप्त मस्तिष्क वाला होता है। इसीलिए इसे 'विभावा' = विशिष्ट दीति वाला कहा गया है, इस प्रकार शरीर व मस्तिष्क के दृष्टिकोण से दीप्त हुआ हुआ (ऋताय) = जीवन में यज्ञ की सिद्धि के लिए (सप्त पदानि दधिषे) = सात कदमों को धारण करता है। विवाह संस्कार में ये सात कदम 'सप्तपदी' के रूप में कहे जाते हैं । वस्तुतः सम्पूर्ण अभ्युदय के लिए ये सात कदम आवश्यक ही हैं। '[क] अन्न को जुटाना, [ख] बल व प्राणशक्ति के वर्धक अन्न का सेवन, [ग] धनार्जन, [घ] स्वास्थ्य की स्थिरता, [ङ] उत्तम सन्तान, [च] दिनचर्या का नियम तथा [छ] परस्पर मित्रभाव' इस सात बातों के होने पर जीवन सुन्दर व यज्ञमय बन पाता है। इन सात कदमों को धारण करनेवाला व्यक्ति स्वायै तन्वे इस अपने शरीर से मित्रं उस मित्रभूत प्रभु को जनयन् प्रकट करनेवाला होता है। यह अपने हृदय में प्रभु के प्रकाश को तो देखता ही है, इसके जीवन की क्रियाओं में लोगों को प्रभु की तेजोज्योति का अंश दिखता है । एवं इसके जीवन से प्रभु का प्रकाश होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें प्रतिदिन आगे बढ़ना है, विशिष्ट दीप्ति वाला बनना है। यज्ञ की सिद्धि के लिए सात कदमों को रखते हुए हम अपने शरीरों से प्रभु की अभिव्यक्ति करें।