पदार्थान्वयभाषाः - (यः) = जो (पित्रोः) = द्यावापृथिवी के, मस्तिष्क व शरीर के (मूर्धानम्) = शिखर को (आ अरब्ध) = पहुँचने के लिए सब प्रकार से यत्न प्रारम्भ करता है। अर्थात् शरीर को पूर्ण स्वस्थ रखकर शारीरिक उन्नति के शिखर पर पहुँचता है और मस्तिष्क को ऊँचे से ऊँचे ज्ञान से परिपूर्ण करके मस्तिष्क के शिखर पर पहुँचता है। (सूरः) [सूर्यते be firm] = जो दृढ़ वृत्ति वाले लोग, न्याय मार्ग से न विचलित होनेवाले लोग (अर्णः) = अपनी गति को [ऋ गतौ] (अध्वरे) = हिंसा व कुटिलता से रहित यज्ञात्मक कर्मों में (निदधिरे) = निश्चय से स्थापित करते हैं । अर्थात् सदा यज्ञशील होते हैं, (अस्य) = इस अग्रेणी प्रभु के (पत्मन्) = मार्ग में (अरुषी:) = आरोचमानाः खूब देदीप्यमान तथा (अश्वबुध्नाः) = व्याप्तमूलाः = व्यापक मूल वाली, 'धर्मार्थकाममोक्षणां आरोग्यं मूलमुत्तमम्' इन शब्दों में वर्णित व्यापक आरोग्य रूप मूल वाली (तन्व:) = तनुओं को, शरीरों को ऋतस्य योनौ ऋत के मूल उत्पत्ति स्थान प्रभु में (जुषन्त) = प्र पूर्वक सेवनवाला करते हैं । अर्थात् अपने 'स्थूल, सूक्ष्म व कारण' शरीरों से उस प्रभु का ही सेवन करते हैं जो प्रभु ऋत के उत्पत्ति स्थान हैं। सब प्राकृतिक नियम उस प्रभु से ही उत्पन्न किये जाते हैं, प्रभु 'ऋत के योनि ' हैं 'ऋतं च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत' प्रभु के सेवन व उपासन के लिये वे इन शरीरों को व्यापक आरोग्य रूप मूल वाला बनाते हैं, वे शरीर को, मन को व मस्तिष्क को सभी को स्वस्थ बनाकर प्रभु उपासन में प्रवृत्त होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हमें चाहिए कि शरीर व मस्तिष्क की उन्नति के शिखर पर पहुँचें । अविचलित भाव से यज्ञनिष्ठ बनें। आरोग्य साधन कर प्रभु उपासन में प्रवृत्त हों ।