पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वनेजा) = [वने संभजने जातः] उपासना में ही निवास करनेवाला उपासक (ऋजीतिभिः) = [ऋजु+अत्] सरल मार्ग से गतिरूप (रशनाभिः) = लगामों के द्वारा (गृभीतान्) = ग्रहण किये हुए, वश में किये हुए (विषूचः) = [वि सु अच्] विविध दिशाओं में जानेवाले (अश्वान्) = इन्द्रिय रूप अश्वों को (युयुजे) = अपने इस शरीर रूप रथ में जोतता है । जब हम अपने जीवन का सूत्र 'ऋजुता' को बना लेते हैं तभी इन्द्रियों को वश में कर पाते हैं। (ऋजुता) = सरलता ही ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग है, कुटिलता मृत्यु का मार्ग है। [२] इस ऋजुता के मार्ग से चलता हुआ, इन्द्रियों को वश में करनेवाला पुरुष (वसुभिः) = निवास के लिये आवश्यक तत्त्वों से (सुजातः) = उत्तम प्रादुर्भाववाला और अतएव (मित्र:) = [प्रमीतेः त्रायते] अपने को रोगों व मृत्यु से बचानेवाला (चक्षदे) = [ शकली करोति] वासनाओं को टुकड़े-टुकड़े कर देता है । वासनाओं को विनष्ट करके, (पर्वभिः) = अपने में सद्गुणों पूरण से [पर्व पूरणे] (वावृधान:) = खूब वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (समावृधे) = सम्यक् जीवनयात्रा को पूर्ण करता है [ऋष् = to accomplish] । [३] वस्तुतः उस प्रभु ने ये इन्द्रियरूप अश्व भी अद्भुत ही प्राप्त कराये हैं । अवशीभूत होने पर ये हमारे महान् पतन का कारण बनते हैं [इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोषमृच्छत्यसंशयम्] । इन्हीं को वश में कर लेने पर ये हमें सिद्धि व सफलता तक ले चलनेवाले होते हैं। के
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जीवन का सूत्र 'सरलता' को बनाकर हम इन्द्रियाश्वों को वश में करते हैं। वशीभूत इन्द्रियाँ हमें जीवनयात्रा को सफलता से पूर्ण करने में समर्थ करती हैं। सूक्त के प्रारम्भ में कहते हैं कि शरीर में जबड़ों का कार्य प्रभु की महिमा को प्रकट कर रहा है । [१] मस्तिष्क, आँखें व जिह्वा भी उसकी महिमा को व्यक्त करती हैं, [२] जिह्वा जिन 'कन्द, शाक, अन्न व फलों' को खाती है उन सब में अद्भुत रचना चातुरी का दर्शन होता है, [३] यह भी एक विचित्र व्यवस्था है कि आनेवाला सन्तान माता-पिता की क्षीणता का कारण होता है, [४] 'मनुष्य अग्नि को खिलाता है, अग्नि मनुष्य को' इस प्रकार यह व्यवस्था भी अद्भुत है, [५] प्रकृति के विषय में जरा-सी गलती होती है और कष्ट आता है, [६] इन गलतियों से अपने को बचाकर ही हम जीवनयात्रा को पूर्ण कर पाते हैं, [७] इस लोक में भी हम उत्तम बनते हैं-