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आ व॑ ऋञ्जस ऊ॒र्जां व्यु॑ष्टि॒ष्विन्द्रं॑ म॒रुतो॒ रोद॑सी अनक्तन । उ॒भे यथा॑ नो॒ अह॑नी सचा॒भुवा॒ सद॑:सदो वरिव॒स्यात॑ उ॒द्भिदा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā va ṛñjasa ūrjāṁ vyuṣṭiṣv indram maruto rodasī anaktana | ubhe yathā no ahanī sacābhuvā sadaḥ-sado varivasyāta udbhidā ||

पद पाठ

आ । वः॒ । ऋ॒ञ्ज॒से॒ । ऊ॒र्जाम् । विऽउ॑ष्टिषु । इन्द्र॑म् । म॒रुतः॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒न॒क्त॒न॒ । उ॒भे इति॑ । यथा॑ । नः॒ । अह॑नी॒ इति॑ । स॒चा॒ऽभुवा॑ । सदः॑ऽसदः । व॒रि॒व॒स्यातः॑ । उ॒त्ऽभिदा॑ ॥ १०.७६.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:76» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:8» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में मोक्षप्राप्ति का उपाय, संसारसुख के उपदेश, सदाचरण से जीवन की सफलता, विद्वानों का समागम करना चाहिए इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (वः) तुम विद्वानों को (आ ऋञ्जसे) भली-भाँति अपने अनुकूल बनाता हूँ, कि तुम (ऊर्जां व्युष्टिषु) अन्नादि को विविध कामनाओं में (इन्द्रं मरुतः-रोदसी) ऐश्वर्यवान् परमात्मा को, जीवन्मुक्तों को, पाप से रोकनेवाले मित्र सम्बन्धियों को (अनक्तन) सुखरूप भावित करो (यथा नः) जैसे उस कृपा से हमारे लिये (उभे सचा भुवा-अहनी) दोनों साथ होनेवाले दिन-रात (सदःसदः) घर-घर में (उद्भिदा) दुःखनिवारकरूप में (वरिवस्यातः) सेवन में आवें-दुःखनिवारक होवें ॥१॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों के अनुकूल आचरण करने से अन्नादि की प्राप्ति होती है। परमात्मा को जीवन्मुक्त मित्रसम्बन्धी जन भी अपनाते हैं, दिन-रात भी प्रत्येक घर में सुखदायक व्यतीत होते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मरुत व रोदसी' का अलंकरण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] श० १४ । २, २ । ३३ में 'प्राणा वै ग्रावाणः ' इन शब्दों में प्राणों को 'ग्रावा' कहा है। प्राणशक्ति का मूल 'वीर्य' सोम है । [१] जराकर्ण इन ग्रावों-सोमों को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि (ऊर्जा व्युष्टिषु) = बलों के उदय के निमित्त सब अंग-प्रत्यंगों को शक्ति प्राप्त कराने के निमित्त मैं (वः) = आपको (आ ऋञ्जसे) = सर्वथा प्रसाधित करता हूँ । तुम सिद्ध होकर (इन्द्रम्) = आत्मा को, (मरुतः) = प्राणों को, (रोदसी) = द्यावापृथिवी को मस्तिष्क व शरीर को (अनक्तन) = कान्त व शोभित बनाओ। रक्षित हुए हुए तुम्हारे द्वारा आत्मिक शक्ति का विकास हो, प्राणों की शक्ति का विकास हो, मस्तिष्क ज्ञानोज्ज्वल हो और शरीर स्वास्थ्य की दीप्तिवाला । [२] रक्षित हुए हुए तुम ऐसी कृपा करो कि (यथा) = जिससे (नः) = हमारे (उभे अहनी) = दोनों दिन व रात (सचाभुवा) = सदा उस प्रभु के साथ बीतनेवाले हों। हम जागरित अवस्था में व स्वप्नावस्था में प्रभु का स्मरण करते हुए अपने कार्यों को करनेवाले हों। ये दोनों दिन-रात (उद्भिदा) = हमारी उन्नति का कारण हों तथा (सदः सदः) = प्रत्येक सभा में (वरिवस्यातः) = उस प्रभु का पूजन करनेवाले हों । जब कभी सभाओं में हम एकत्रित हों तो प्रभु के गुणों का ही कीर्तन करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम शरीर में सोमकणों का प्रसाधन करें। सारे कार्यों को करते हुए प्रभु को न भूलें।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते वेदे मोक्षप्राप्तेरुपायः संसारसुखस्य चोपदेशाः सन्ति सदाचरणेन जीवनसाफल्यं विदुषां समागमः करणीय इत्येवमादयो विषयाः प्रदर्श्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (वः) युष्मान् विदुषः (आ-ऋञ्जसे) समन्तात् प्रसाधयामि प्रार्थयेऽनुकूलान् सेवे यद् यूयम् (ऊर्जां व्युष्टिषु) अन्नादि-वस्तूनां कमनीयप्रवृत्तिषु “व्युष्टिषु विविधा उष्टयः कामनाश्च तासु” [ऋ० १।४४।३ दयानन्दः] (इन्द्रं मरुतः-रोदसी-अनक्तन) ऐश्वर्यवन्तं परमात्मानं रोदसी रोधसी पापाद् रोधयितारौ मित्रसम्बन्धिनौ जीवन्मुक्तान् “मरुतो वै देवविशः” [कौ० ७।८] “रोदसी रोधसी” [निरु० ६।१] सम्पादयत भावयत (यथा नः-उभे सचाभुवा-अहनी) यथा हि तया कृपया अस्मभ्यम्-उभौ सहभुवौ-अहोरात्रौ (सदः सदः) गृहे गृहे “ङि प्रत्ययस्य लुक्” सुपां सुलुक्० [अष्टा० ७।१।३९] (उद्भिदा) दुःखनिवारकत्वेन “उद्भिदाः-दुःखनिवारकाः” [ऋ० १।८९।१ दयानन्दः] (वरिवस्यातः) सेवेताम्-दुखनिवारकौ भवेताम् ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O scholars and celebrants of yajna, creators of soma wealth, I honour and cooperate with you at the dawn of light and energy in the morning. Pray honour, celebrate and serve Indra, the sun, the winds, the earth and the environment and reveal their power and potential for us so that both day and night they may produce and give us wealth bom of earth for every home.