पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यद्) = जब (देवाः) = सब देव प्रकृति से उत्पन्न हुए हुए लोक - लोकान्तर (भुवनानि) = इस मर्त्यलोकस्थ प्राणियों को उसी प्रकार (अपिन्वत) = प्रीणित करते हैं (यथा) = जैसे कि (यतयः) = मेघ [जलं नियमयन्ति इति यतयः सा० ], उस समय (अत्रा समुद्रे) = इस अन्तरिक्ष में (सूर्यम्) = सूर्य को (आ-अजभर्तन) = धारण करते हैं, उस सूर्य को जो (गूढम्) = प्रकृति में संवृत रूप में विद्यमान था।[२] मेघ अपने वृष्टिजल से उन सब प्राणियों को शान्ति प्राप्त कराते हैं जो गर्मी के सन्ताप से व्याकुल हो रहे थे। तथा ये मेघ ही वृष्टि द्वारा पृथिवी में अन्नों को उत्पन्न करके प्राणियों की शान्ति का कारण बनते हैं। इसी प्रकार इस ब्रह्माण्ड के सभी लोक-लोकान्तर इन प्राणियों को अपनी विविध देनों के द्वारा प्रीणित करनेवाले होते हैं। इन देवों में सब से महत्त्वपूर्ण स्थान इस सूर्य का है जो प्रजाओं के प्राण के ही रूप में उदित होता है । यह सूर्य भी अन्य लोकों की तरह प्रकृति में छिपा हुआ था। इसे प्रकट करके आकाश में स्थापित किया गया, जिससे यह प्रकाश के द्वारा अन्धकार को दूर करता हुआ सब प्राणियों के अन्दर प्राणशक्ति का संचार करनेवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रकृति से बने सभी प्रकाशमान पिण्ड प्राणियों को अपनी-अपनी देन से प्रीणित करते हैं, सूर्य का आकाश में धारण प्राणियों में प्राणशक्ति के संचार के लिये ही तो हुआ है ।