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अ॒क्ष॒ण्वन्त॒: कर्ण॑वन्त॒: सखा॑यो मनोज॒वेष्वस॑मा बभूवुः । आ॒द॒घ्नास॑ उपक॒क्षास॑ उ त्वे ह्र॒दा इ॑व॒ स्नात्वा॑ उ त्वे ददृश्रे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

akṣaṇvantaḥ karṇavantaḥ sakhāyo manojaveṣv asamā babhūvuḥ | ādaghnāsa upakakṣāsa u tve hradā iva snātvā u tve dadṛśre ||

पद पाठ

अ॒क्ष॒ण्ऽवन्तः॑ । कर्ण॑ऽवन्तः । सखा॑यः । म॒नः॒ऽज॒वेषु॑ । अस॑माः । ब॒भू॒वुः॒ । आ॒द॒घ्नासः॑ । उ॒प॒ऽक॒क्षासः॑ । ऊँ॒ इति॑ । त्वे॒ । ह्र॒दाःऽइ॑व । स्नात्वाः॑ । ऊँ॒ इति॑ । त्वे॒ । द॒दृ॒श्रे॒ ॥ १०.७१.७

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:71» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:7


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायः) आँखवाले कानवाले समानरूपवाले होते हुए (मनोजवेषु) मन के वेगों-व्यापारों में (असमाः बभूवुः) असमान अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रवृत्तिवाले होते हैं,, उनमें (आदघ्नासः) मुखप्रमाणवाले (उपकक्षासः) कक्षाप्रमाणवाले (उ त्वे) कुछ एक (ह्रदा-इव स्नात्वाः ददृश्रे) जलाशय में जैसे स्नान करने योग्य दिखलायी पड़ते हैं, ये ज्ञानवाले मनुष्यों की गतियाँ हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - आँखवाले कानवाले बाहरी आकृति में समान दीखते हुए भी मन के वेगों अर्थात् मानसिक विचारों प्रवृत्तियों में भिन्न-भिन्न होते हैं, भिन्न-भिन्न ज्ञान के कारण जैसे किसी एक जलाशय में किसी मनुष्य के कक्षा तक पानी आता है, किसी के मुख तक, कोई पूरा डूब जाता है भिन्न-भिन्न शरीरों के कारण। इसी प्रकार ज्ञान की भिन्न-भिन्न गतियाँ हैं ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान में विषमता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अक्षण्वन्तः) = आँखोंवाले तथा (कर्णवन्तः) = कानोंवाले (सखाया) = एक ही श्रेणी में ज्ञान को प्राप्त करनेवाले [ समानं ख्यानं येषां ] युवक होते हैं। इनकी आँखें बाह्य पदार्थों को ठीक से देखती हैं, कान बाह्य शब्दों को ठीक से सुनते हैं एक ही गुरु से ये ज्ञान प्राप्त कर रहे होते हैं । ऐसा होते हुए भी (मनोजवेषु) = मन के वेगों में (असमा बभूवुः) = ये समान नहीं होते। इनका मन दिये जाते हुए ज्ञान को समानरूप से ग्रहण नहीं करता। [२] ज्ञान को यदि जल से उपमित करें, तो इनमें से कई (आदध्नासः) = आस्य प्रमाण उदकवाले होते हैं, कइयों के ज्ञान सरोवर में मुख तक आनेवाला ज्ञान जल भरा होता है । (उ) = और (त्वे) = कई (उपकक्षासः) = बाहुमूलपर्यन्त आनेवाले ज्ञान जलवाले होते हैं। (उ) = और (त्वे) = कई तो (स्नात्वा: हृदाः इव) = स्नानीय तालाबों के समान परिपूर्ण जलवाले, डुबाऊ जलवाले (ददृश्रे) = दिखाई पड़ते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - बाह्य वातावरण की समानता हुए भी मनोजवों की विषमता के कारण एक होते ही श्रेणी के विद्यार्थियों में ज्ञान की विषमता हो जाती है। 'स्नात्वा: हृदाः इव' प्रथम विभाग के हैं, 'आदध्नासः' द्वितीय विभाग के तथा 'उपकक्षासः ' तृतीयविभाग के ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायः) अक्षिमन्तः कर्णवन्तः समानख्यानाः समानरूपाः सन्तः (मनो जवेषु-असमाः-बभूवुः) मनसो वेगेषु व्यापारेषु खल्वसमानाः-भिन्न-भिन्नप्रवृत्तयो भवन्ति, तत्र (आदघ्नासः) आस्यदधानाः-मुखप्रमाणाः (उपकक्षासः) कक्षापर्यन्तप्रमाणाः (उ त्वे) एके खलु (ह्रदा-इव स्नात्वाः-ददृश्रे) जलाशये यथा स्नातुं योग्या एके दृश्यन्ते। इति ज्ञानवतां गतयः ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indeed friends and companions equal of eyes and ears are unequal in mind and intellectual efficiency. Some are like tanks just waist deep, others neck deep, and yet others are deep as lakes, rivers or even seas wherein you bathe and feel sanctified and absolved.