वांछित मन्त्र चुनें
390 बार पढ़ा गया

घृ॒तम॒ग्नेर्व॑ध्र्य॒श्वस्य॒ वर्ध॑नं घृ॒तमन्नं॑ घृ॒तम्व॑स्य॒ मेद॑नम् । घृ॒तेनाहु॑त उर्वि॒या वि प॑प्रथे॒ सूर्य॑ इव रोचते स॒र्पिरा॑सुतिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ghṛtam agner vadhryaśvasya vardhanaṁ ghṛtam annaṁ ghṛtam v asya medanam | ghṛtenāhuta urviyā vi paprathe sūrya iva rocate sarpirāsutiḥ ||

पद पाठ

घृ॒तम् । अ॒ग्नेः । व॒ध्रि॒ऽअ॒श्वस्य॑ । वर्ध॑नम् । घृ॒तम् । अन्न॑म् । घृ॒तम् । ऊँ॒ इति॑ । अ॒स्य॒ । भेद॑नम् । घृ॒तेन॑ । आऽहु॑तः । उ॒र्वि॒या । वि । प॒प्र॒थे॒ । सूर्यः॑ऽइव । रो॒च॒ते॒ । स॒र्पिःऽआ॑सुतिः ॥ १०.६९.२

390 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:69» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:2


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वध्र्यश्वस्य-अग्नेः) नियन्त्रित अश्ववाले या जितेन्द्रिय राजा के (घृतम्-अन्नम्) जिसका प्राणवाला जीवन है (वर्धनम्) बढ़ने के निमित्त (घृतम्-उ-अस्य मेदनम्) तेज इस राजा का सम्मेलन साधन है (आहुतः) स्वीकृत हुआ (घृतेन-उर्विया विपप्रथे) तेज से विशेषरूप में बहुत विख्यात होता है (सूर्य-इव) सूर्य के समान (सर्पिरासुतिः) सर्पणशील ज्ञानप्रेरकों से सुशोभित होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - नियन्त्रित घोड़ों और इन्द्रियोंवाला राजा, जिसका तेज ही लोगों का सम्मलेन साधन है, वह तेज से विशेषरूप में प्रसिद्ध होता है और सूर्य के समान वह सर्पणशील प्रजाओं द्वारा प्रेरित किया प्रकाशित होता है ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'घृतम् आयुः'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वध्र्यश्वस्य) = संयम रूप रज्जु से इन्द्रियाश्वों को बाँधनेवाले (अग्नेः) = प्रगतिशील पुरुष का (घृतम्) = घृत (वर्धनम्) = वृद्धि का कारण होता है । 'घृतम् आयुः' 'घृत जीवन है' इस तत्त्व को समझता हुआ यह वध्र्यस्व घृत को महत्त्व देता है, और घृत के उचित मात्रा में प्रयोग से यह अपना वर्धन करता है । 'घृत क्षरणदीस्यो:' इस धातु के अनुसार यह घृत इसके मलों का क्षरण करनेवाला व इसकी बुद्धि को ज्ञानदीप्त करनेवाला होता है। (घृतं अन्नम्) = यह घृत ही इसका अन्न, इसका भक्षणीय हो जाता है। (उ) = और (घृतम्) = घृत ही (अस्य मेदनम्) = इसके शरीर में उचित मेदस् तत्त्व को लानेवाला बनता है । [२] यह वध्र्यश्व भोजन को भी एक यज्ञ का रूप देता है, जिसमें कि इसकी उदरस्थ वैश्वानराग्नि में घृत की आहुति पड़ती है। (घृतेन) = घृत से (आहुतः) = आहुत हुआ-हुआ यह (उर्विया विपप्रथे) = खूब ही विस्तृत होता है, इसकी शक्तियों का ठीक विस्तार होता है । यह (सर्पिरासुतिः) = जिसके लिये घृत का आसवन [-उत्पादन] किया जाता है वह वध्र्यश्व (सूर्य इव) = सूर्य के समान (रोचते) = चमकता है। पूर्ण स्वस्थ होने से इसका इस प्रकार चमकना स्वाभाविक ही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वध्र्यश्व अपने भोजन में घृत की मात्रा के महत्त्व को समझता हुआ उसका ठीक प्रयोग करता है और सूर्य के समान चमकता है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वध्र्यश्वस्य-अग्नेः) नियन्त्रिताश्ववतो जितेन्द्रियस्य वा अग्रणेतुः (घृतम्-अन्नम्) तेजो प्राणवज्जीवनमिव (वर्धनम्) वर्धननिमित्तं (घृतम्-उ-अस्य मेदनम्) तेज एवास्य नेतुः सम्मेलनसाधनं (आहुतः) स्वीकृतः सन् (घृतेन-उर्विया विपप्रथे) तेजसा खलु बहुविशिष्टतया प्रख्यातो भवति (सूर्यः-इव सर्पिरासुतिः रोचते) सूर्य इव सर्पणशीलैर्ज्ञानप्रेरकैः प्रेरितः शोभते ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ghrta means and is the rise and exaltation of self-controlled self-directed Agni, ghrta is the food, and ghrta is the growth and expansion with love and grace. Fed on ghrta it rises and expands unbounded and, kindled, energised and exalted with ghrta, it shines glorious and beatific like the sun.