पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वध्र्यश्वस्य) = संयम रूप रज्जु से इन्द्रियाश्वों को बाँधनेवाले (अग्नेः) = प्रगतिशील पुरुष का (घृतम्) = घृत (वर्धनम्) = वृद्धि का कारण होता है । 'घृतम् आयुः' 'घृत जीवन है' इस तत्त्व को समझता हुआ यह वध्र्यस्व घृत को महत्त्व देता है, और घृत के उचित मात्रा में प्रयोग से यह अपना वर्धन करता है । 'घृत क्षरणदीस्यो:' इस धातु के अनुसार यह घृत इसके मलों का क्षरण करनेवाला व इसकी बुद्धि को ज्ञानदीप्त करनेवाला होता है। (घृतं अन्नम्) = यह घृत ही इसका अन्न, इसका भक्षणीय हो जाता है। (उ) = और (घृतम्) = घृत ही (अस्य मेदनम्) = इसके शरीर में उचित मेदस् तत्त्व को लानेवाला बनता है । [२] यह वध्र्यश्व भोजन को भी एक यज्ञ का रूप देता है, जिसमें कि इसकी उदरस्थ वैश्वानराग्नि में घृत की आहुति पड़ती है। (घृतेन) = घृत से (आहुतः) = आहुत हुआ-हुआ यह (उर्विया विपप्रथे) = खूब ही विस्तृत होता है, इसकी शक्तियों का ठीक विस्तार होता है । यह (सर्पिरासुतिः) = जिसके लिये घृत का आसवन [-उत्पादन] किया जाता है वह वध्र्यश्व (सूर्य इव) = सूर्य के समान (रोचते) = चमकता है। पूर्ण स्वस्थ होने से इसका इस प्रकार चमकना स्वाभाविक ही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वध्र्यश्व अपने भोजन में घृत की मात्रा के महत्त्व को समझता हुआ उसका ठीक प्रयोग करता है और सूर्य के समान चमकता है।