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अ॒यम॒ग्निर्व॑ध्र्य॒श्वस्य॑ वृत्र॒हा स॑न॒कात्प्रेद्धो॒ नम॑सोपवा॒क्य॑: । स नो॒ अजा॑मीँरु॒त वा॒ विजा॑मीन॒भि ति॑ष्ठ॒ शर्ध॑तो वाध्र्यश्व ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayam agnir vadhryaśvasya vṛtrahā sanakāt preddho namasopavākyaḥ | sa no ajāmīm̐r uta vā vijāmīn abhi tiṣṭha śardhato vādhryaśva ||

पद पाठ

अ॒यम् । अ॒ग्निः । व॒ध्रि॒ऽअ॒श्वस्य॑ । वृ॒त्र॒ऽहा । स॒न॒कात् । प्रऽइ॑द्धः । नम॑सा । उ॒प॒ऽवा॒क्यः॑ । सः । नः॒ । अजा॑मीन् । उ॒त । वा॒ । विऽजा॑मीन् । अ॒भि । ति॒ष्ठ॒ । शर्ध॑तः । वा॒ध्रि॒ऽअ॒श्व॒ ॥ १०.६९.१२

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:69» मन्त्र:12 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:20» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:12


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वध्र्यश्वस्य) जितेन्द्रिय मनुष्य की (नमसा-उपवाक्यः) स्तुति से उपास्य प्रशंसनीय (अयम्-अग्निः) यह अग्रणायक परमात्मा है (सनकात्  प्रेद्धः-वृत्रहा) पुरातन काल से आत्मा में साक्षात् किया हुआ पापनाशक है (सः) वह तू (वाध्र्यश्व) जितेन्द्रिय मनुष्य के उपास्यदेव हे परमात्मन् ! (नः) हमारे (अजामीन्-उत वा विजामीन् शर्धतः-अभितिष्ठ) जन्म से असम्बधियों और विपरीत सम्बन्धियों विरोधियों को बल प्रदर्शित करते हुओं को दबा अभिभूत कर ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जितेन्द्रिय उपासक जब परमात्मा की उपासना करता है, तो परमात्मा उसे पापों से बचाता है तथा उसके साथ सम्बन्ध न रखनेवाले बाधकों को और विपरीत सम्बन्ध रखनेवाले बाधकों को वह दबा देता है ॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नमसा उपवाक्यः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अयं अग्निः) = यह अग्रेणी प्रभु (वध्र्यश्वस्य) = संयम रज्जु से अपने को बाँधनेवाले पुरुष के (वृत्रहा) = ज्ञान की आवरणभूत [= वृत्र] वासना का विनाश करनेवाला होता है [हा] । (प्रेद्ध:) = हदयदेश में चिन्तन के द्वारा समिद्ध किया हुआ यह प्रभु (सनकात्) = सनातन काल से (नमसा उपवाक्यः) = नमन के द्वारा समीपता से स्तुति के योग्य होता है संयमी पुरुष हृदय में प्रभु का साक्षात्कार करने का प्रयत्न करता है, उस प्रभु के प्रति नतमस्तक होता है, उसका स्तवन करता है। प्रभु इस संयमी पुरुष के वासनारूप शत्रुओं का विनाश करते हैं । [२] हे (वाध्र्यश्व) = संयमी पुरुष को अपना ही रूप समझनेवाले प्रभो ! (स) = वे आप (नः) = हमारे (अजामीन्) = शत्रुभूत कामादि को (उत वा) = तथा (शर्धतः) = हमारा हिंसन करनेवाले (विजामीन्) = विविध बन्धुओं को भी (अभितिष्ठ) = अभिभूत करनेवाले होइये । हमें पराये व अपने किसी से भी हिंसित न होने दीजिये ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-संयमी पुरुष प्रभु का स्तवन करता है, प्रभु इसके कामादि शत्रुओं का विनाश करते हैं। यह संयमी पुरुष प्रभु को आत्मतुल्य प्रिय होता है और प्रभु इसके पराये व अपने सभी हिंसकों को अभिभूत करते हैं । सूक्त के प्रारम्भ में कहा है कि संयमी पुरुष का दृष्टिकोण उत्तम होता है, [१] अन्त में कहते हैं कि यह सदा प्रभु का स्तवन करनेवाला होता है, [१२] अगले सूक्त में भी सुमित्र यही कहता है कि, 'मेरी ज्ञानदीप्ति मुझे आपका प्रिय बनाये'-

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वध्र्यश्वस्य) नियन्त्रितेन्द्रियस्य (नमसा-उपवाक्यः) स्तुत्यां खलूपास्यः प्रशंसनीयः (अयम्-अग्निः) एषोऽग्रणायकः परमात्मा (सनकात् प्रेद्धः-वृत्रहा) पुरातनात् कालात्-चिरमिति यावत् स्वात्मनि साक्षात्कृतः पापनाशकोऽस्ति (सः) स त्वं (वाध्र्यश्व) जितेन्द्रियस्योपास्य परमात्मन् ! (नः) अस्माकं (अजामीन्-उत वा विजामीन् शर्धतः-अभितिष्ठ) जन्मतोऽसम्बन्धिनो विगत सम्बन्धिनः-विरोधिनश्च बलं प्रदर्शयतोऽभिभव ॥१२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This Agni, lord of self-refulgent light, all time invoked and lighted with prayer and homage, is the dispeller of darkness for the devotee of controlled mind and senses. O lord and leader of light and life, face upto and overthrow our enemies whether they are united as a community of saboteurs or as a hoard of heterogeneous antisocial destroyers.