पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वसिष्ठासः) = अपने निवास को अत्यन्त उत्तम बनानेवाले ज्ञानी पुरुष (पितृवत्) = पिता की तरह (वाचं अक्रत) = ज्ञान की वाणियों का उपदेश करनेवाले होते हैं । जैसे पिता पुत्र के लिये प्रेम से प्रेरणा को प्राप्त कराता है, इसी प्रकार ये वसिष्ठ हमारे लिये प्रेम से ज्ञानोपदेश को करनेवाले होते हैं । [२] (देवान् ईडाना) = देवों का स्तवन करते हुए, अर्थात् देवों से देवत्व को प्राप्त करते हुए ये (ऋषिवत्) = तत्त्वद्रष्टा की तरह ज्ञान को देते हैं जिससे (स्वस्तये) = हमारा कल्याण हो। इनका उपदेश एक पिता की तरह प्रेम से दिया जाता है और ऋषि की तरह तात्त्विकता को लिये हुए होता है। इस प्रकार प्रेम से दिया हुआ तत्त्वज्ञान का उपदेश हमारा कल्याण करता है। [२] हे (देवास:) = देवो! (प्रीताः ज्ञातयः इव) = प्रसन्न हुए हुए बन्धुओं की तरह (कामं एत्य) = प्रसन्नतापूर्वक आकर (अस्मे) = हमारे लिये (वसु) = धन को (अवधूनुत) = प्रेरित करो। जैसे बन्धु किसी उत्सव में सम्मिलित होने पर कुछ धन स्वेच्छा से देनेवाले होते हैं, इसी प्रकार देव हमें दैवी सम्पत्ति रूप धन को देनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्वयं उत्तम निवासवाले लोग प्रेम से हमें तत्त्वद्रष्टा पुरुष की भान्ति उपदेश करें। देव हमें दैवी सम्पत्ति के देनेवाले हों ।