पदार्थान्वयभाषाः - [१] मनुष्य भोग-प्रवण होने पर 'भुज्यु' कहलाता है, भुज् - भोगों को यु-अपने साथ जोड़नेवाला। प्राणसाधना करने पर यह भोगवृत्ति दूर हो जाती है और मनुष्य विषय-वासनाओं के समुद्र में डूबने से बच जाता है। हे (अश्विना) = प्राणपानो! आप (भुज्युम्) = भोग-प्रवण व्यक्ति को (अंहसः) = पापों से (नि: पिपृथः) = पार कर देते हो, पाप समुद्र में डूबने नहीं देते । [२] (वधिमत्या) = इन्द्रियों, मन व बुद्धि का बन्धन व संयम करनेवाली [वधी - रस्सी] गृहिणी के लिये आप (श्यावं पुत्रम्) = गतिशील सन्तान को (अजिन्वतम्) = देते हो। माता के संयम का पुत्रों के जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ता है। माता संयमवाली होती है, तो सन्तान भी संयम के द्वारा शक्ति व गतिवाली बनती है। [३] (युवम्) = आप दोनों (विमदाय) = मदशून्य विनीत व्यक्ति के लिये (कमद्युवम्) = कमनीयता व सौन्दर्य को द्योतित करनेवाली वेदवाणी को (ऊहथुः) = प्राप्त कराते हैं । वेदवाणी विमद की पत्नी बनती है और उसके जीवन को सौन्दर्य से परिपूर्ण कर देती है । [४] (विश्वकाय) = [विश्वस्य अनुकम्पकाय] सब पर अनुकम्पा करनेवाले इस विश्वक के लिये आप (विष्णाप्वम्) = व्यापक कर्म को (अवसृजथः) = उत्पन्न करते हो । स्वार्थवृत्ति से होनेवाला कर्म संकुचित होता है, स्वार्थ से जितना-जितना हम ऊपर उठते जाते हैं उतना उतना हमारे कर्म व्यापकता को लिये हुए होते हैं । यही विश्वक के लिये विष्णाप्व की प्राप्ति है। विष्णाप्व विश्वक का पुत्र है, [पुनाति त्रायते] उसके जीवन को पवित्र बनानेवाला तथा उसका त्राण करनेवाला है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - [क] प्राणसाधना से हम भोगवृत्ति से ऊपर उठते हैं, [ख] संयमी जीवन के होने पर हमारी सन्तानें उत्तम होती हैं, [ग] ये वि-मद सन्तानें वेदवाणी के द्वारा अपने जीवन को सौन्दर्य से द्योतित करती हैं और [घ] सब पर अनुकम्पावाली होकर ये व्यापक हित के कर्मों को करनेवाली बनती हैं।
अन्य संदर्भ: सूचना - प्रस्तुत मन्त्र में पहले चरण का परिणाम दूसरा चरण है, दूसरे का तीसरा तथा तीसरे का चौथा। एवं यह क्रम मन्त्र को बड़ा ही सुन्दर बना देता है ।