वांछित मन्त्र चुनें
450 बार पढ़ा गया

क॒था क॒विस्तु॑वी॒रवा॒न्कया॑ गि॒रा बृह॒स्पति॑र्वावृधते सुवृ॒क्तिभि॑: । अ॒ज एक॑पात्सु॒हवे॑भि॒ॠक्व॑भि॒रहि॑: शृणोतु बु॒ध्न्यो॒३॒॑ हवी॑मनि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kathā kavis tuvīravān kayā girā bṛhaspatir vāvṛdhate suvṛktibhiḥ | aja ekapāt suhavebhir ṛkvabhir ahiḥ śṛṇotu budhnyo havīmani ||

पद पाठ

क॒था । क॒विः । तु॒वि॒ऽरवा॑न् । कया॑ । गि॒रा । बृह॒स्पतिः॑ । व॒वृ॒ध॒ते॒ । सु॒वृ॒क्तिऽभिः॑ । अ॒जः । एक॑ऽपात् । सु॒ऽहवे॑भिः । ऋक्व॑ऽभिः । अहिः॑ । शृ॒णो॒तु॒ । बु॒ध्न्यः॑ । हवी॑मनि ॥ १०.६४.४

450 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:64» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:4


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तुवीरवान् कविः)  बहुत ज्ञानाधिकरण वेदवाला सर्वज्ञ क्रान्तदर्शी (बृहस्पतिः) परमात्मा (कथा) कैसे (कया गिरा) किस वाणी से (सुवृक्तिभिः) शोभन स्तुतियों के द्वारा (वावृधते) स्तोता के आत्मा में भलीभाँति बढ़ता है-साक्षात् होता है (अजः-एकपात्) वह जगत् में एक अकेला ही अपने गुणों से प्राप्त होनेवाला है (अहिः-बुध्न्यः) अहिंसित नियमोंवाला बोधन करने योग्य है (सुहवेभिः-ऋक्वभिः) सुन्दर हाव-भावों से, ऋचारूप स्तोत्रों से (हवीमनि) ह्वान-प्रार्थनाप्रसङ्ग में (शृणोतु) वह सुने ॥४॥
भावार्थभाषाः - वेदज्ञान का स्वामी परमात्मा स्तुति प्रार्थनाओं द्वारा जब स्तुत किया जाता है, तो वह किसी न किसी प्रकार स्तोता के अन्तरात्मा में सक्षात् होता है और वेदोक्त स्तुति प्रार्थनाओं को अवश्य स्वीकार करता है ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मैं कैसे प्रभु-स्तवन करूँ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभुस्तवन के लिये उत्कण्ठित हुआ हुआ 'गय प्लात' कहता है कि (कथा) = किस प्रकार कया (गिरा) = अत्यन्त आन्तर को देनेवाली वाणी तथा (सुवृक्तिभिः) = अच्छी प्रकार दोषों के वर्जन से वह प्रभु (वृधते) = मेरे द्वारा बढ़ाये जाते हैं, मेरे द्वारा स्तुत होते हैं जो प्रभु (कविः) = क्रान्तदर्शी हैं, सर्वज्ञ हैं । (तुवीरवान्) = [तुवि + ईर+वान्] खूब ही उत्तम प्रेरणा को देनेवाले हैं। (बृहस्पतिः) = ज्ञानियों के भी ज्ञानी हैं 'स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनावच्छेदात्' प्रभु के स्तवन से मैं भी प्रेरणा को प्राप्त करके ज्ञानी बनूँगा । [२] (सुहवेभि:) = उत्तम आह्वानों के द्वारा प्रार्थनाओं के द्वारा तथा (ऋक्वभिः) = स्तुति- वचनों के द्वारा मेरे से वह (अजः) = गति के द्वारा सब मलों का क्षेपण करनेवाला (एकपात्) = [एक = मुख्य ] मुख्य गति देनेवाला [prime morer] प्रभु बढ़ाया जाता है, मेरे से उसकी महिमा का विस्तार किया जाता है। इस प्रभु की महिमा का स्मरण करता हुआ मैं भी गतिशील बनूँ और अपने जीवन को निर्मल बना पाऊँ। [३] (हवीमनि) = पुकारे जाने पर वह (अहिः) = [अह व्याप्तौ] सर्वव्यापक (बुध्न्यः) = मूल में होनेवाला, अर्थात् सारे ब्रह्माण्ड का आधारभूत वह ब्रह्म (शृणोतु) = हमारे प्रार्थना-वचनों को सुने । हमारी प्रार्थना अनसुनी न हो जाए। सर्वव्यापक होने से ही वे प्रभु सारे ब्रह्माण्ड का आधार हैं। मुझे भी तो वे ही आधार देंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्रभु की प्रेरणा को सुनें, उसकी तरह ही गतिशील हों, उसी को अपना आधार समझें ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तुवीरवान् कविः) बहुज्ञानवन्तः स्वामी “तुवि बहुनाम” [निघ० ३।१] बहूनि ज्ञानानि विद्यन्ते यस्मिन् स वेदस्तद्वान् क्रान्तदर्शी सर्वज्ञः (बृहस्पतिः) परमात्मा (कथा) कथं (कया गिरा) कया वाचा “गीर्वाङ्नाम” [निघ० १।११] (सुवृक्तिभिः) सुस्तुतिभिः “सुवृक्तिभिः-शोभनाभिः स्तुतिभिः” [निरु०  २।२४] (वावृधते) स्तोतुरात्मनि भृशं वर्धते साक्षाद् भवति (अजः-एकपात्) स खलु जगत्येक एव स्वगुणैः प्राप्तो भवति (अहिः-बुध्न्यः) अहन्तव्यनियमः बोधव्यः (सुहवेभिः-ऋक्वभिः) शोभनाह्वानैः-ऋक्स्तोत्रैः (हवीमनि) ह्वानप्रसङ्गे (शृणोतु) शृणुयात् ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - How, by what words, with which mantric voices and yajnic actions is the omniscient poet, master ruler and almighty commander of infinite forces studied, celebrated and known in his infinite nature and presence? In yajnic acts of search for knowledge, with holy words of celebrative language used with honest intention, unambiguous resolution and faithful purpose, is the one absolute power, unborn and undying, thunderous presence in space, celebrated and, if you use that language with that resolution in those actions, he would listen and respond.