पदार्थान्वयभाषाः - [१] गय प्लात से ही कहते हैं कि तू (गिरः) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (वा) = निश्चय से उस प्रभु का (अभ्यर्चसे) = स्तवन करता है जो प्रभु (नराशंसम्) = मनुष्यों से शंसन के योग्य हैं, जिनका शंसन मनुष्य को जीवन में प्रेरणा प्राप्त कराता है। (पूषणम्) = जो प्रभु पोषण करनेवाले हैं, प्रभु ही पोषण के सब साधनों को उत्पन्न करनेवाले हैं । (अगोह्यम्) = निराकार होते हुए भी जिनका छिपाना कठिन है, उस प्रभु की महिमा कण-कण में प्रकट होती है, प्रत्येक फूल व तारा प्रभु की महिमा का गायन कर रहा है। (अग्निम्) = वे प्रभु अग्रणी हैं, हमें उन्नतिपथ पर आगे और आगे ले चलते हैं । (देवेद्धम्) = वे देवों से अपने हृदयों में [= प्रकाशित] किये जाते हैं। इन प्रभु का स्तवन हमें जीवन में पथ-प्रदर्शक व सहायक होता है । [२] इन प्रभु का स्तवन करने के लिये ही (सूर्यामासा) = सूर्य की गति से बनाये जानेवाले बारह मासों का मैं स्तवन करता हूँ। इन मासों के स्तवन का स्वरूप यही है कि मैं इस संसार वृक्ष की विशिष्ट शाखा बनूँगा [वि-शाखा] यह संकल्प मुझे ज्येष्ठता प्रदान करेगा [ज्येष्ठा] मैं काम-क्रोध-लोभ से पराभूत न होऊँगा [अ-षाढा] इस अपराभव में ज्ञान का श्रवण मेरा सहायक होगा [ श्रवणा] यह श्रवण ही कल्याण का मार्ग है [भद्र - पदा] इस पर मैं आज से ही चलूँगा [अ-श्विनी] और कामादि शत्रुओं का कर्तन करने लगूँगा [कृत्तिका] आत्मालोचन के द्वारा इन शत्रुओं के अन्वेषण करनेवालों का शिरोमणि बनूँगा [ मृगशिरस् ] बस यही मार्ग मेरा वास्तविक पोषण करेगा [पुष्य] मैं वास्तविक ऐश्वर्य को प्राप्त करूँगा [मघा] इस ऐश्वर्य की तुलना में मुझे सांसारिक ऐश्वर्य तुच्छ जचेगा [ फल्गुनी] यही मेरे जीवन का आश्चर्यजनक कर्म [miracle] होगा [चित्रा] । [३] (चन्द्रमसा) = इन मासों का स्तवन मैं चन्द्रा के साथ करता हूँ। चन्द्रमा से 'चदि आह्लादे' सदा मन की प्रसन्नता का पाठ पढ़ता हूँ । इस मनः प्रसाद के होने पर (दिवियमम्) = प्रकाशमय रूप में स्थित उस नियन्ता प्रभु को याद करता हूँ । मनः प्रसाद के होने पर प्रभु का प्रकाश दिखता ही है। यह प्रकाश हमें जीवन के मार्ग में नियन्त्रित करनेवाला होता है । [४] इस प्रकाश की प्राप्ति के लिये ही हम (त्रितम्) = ज्ञान, कर्म व उपासना तीनों में तीर्णतम [= अत्युच्च स्थिति में स्थित ] पुरुष का आदर करते हैं, आदरपूर्वक उसके समीप उपस्थित होते हैं। इसका सम्पर्क हमारे जीवन को भी उच्च करेगा। [५] (वातम्) = मैं वायु का उपासन करता हूँ, (उषसम्) = उषा का उपासन करता हूँ और (अश्विना) = प्राणापानों का उपासन करता हूँ। वायु की तरह सतत क्रियाशील जीवनवाला बनता हूँ। उषा की तरह अज्ञानान्धकार का दहन करनेवाला होता हूँ। प्राणापान के द्वारा प्राणसाधना करता हुआ मैं उल्लिखित सब देवों व परमदेव का उपासक बन पाता हूँ। उपासना के लिये आवश्यक चित्तवृत्ति का निरोध प्राणसाधना से ही तो होना है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम परमदेव के दर्शन के लिये सूर्य, चन्द्र, वायु व उषा आदि देवों का उपासन करते हैं, इनकी विशेषताओं को अपने जीवनों में धारण करते हैं ।