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नरा॑ वा॒ शंसं॑ पू॒षण॒मगो॑ह्यम॒ग्निं दे॒वेद्ध॑म॒भ्य॑र्चसे गि॒रा । सूर्या॒मासा॑ च॒न्द्रम॑सा य॒मं दि॒वि त्रि॒तं वात॑मु॒षस॑म॒क्तुम॒श्विना॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

narā vā śaṁsam pūṣaṇam agohyam agniṁ deveddham abhy arcase girā | sūryāmāsā candramasā yamaṁ divi tritaṁ vātam uṣasam aktum aśvinā ||

पद पाठ

नरा॒शंस॑म् । वा॒ । पू॒षण॑म् । अगो॑ह्यम् । अ॒ग्निम् । दे॒वऽइ॑द्धम् । अ॒भि । अ॒र्च॒से॒ । गि॒रा । सूर्या॒मासा॑ । च॒न्द्रम॑सा । य॒मम् । दि॒वि । त्रि॒तम् । वात॑म् । उ॒षस॑म् । अ॒क्तुम् । अ॒श्विना॑ ॥ १०.६४.३

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:64» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:3


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वा) और (नराशंसम्) मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय (पूषणम्) पोषण करनेवाले (अगोह्यम्-अग्निम्) प्रत्यक्ष करने योग्य अग्निरूप (देवेद्धम्) देवों-विद्वानों द्वारा साक्षात् करने योग्य परमात्मा को (गिरा-अभ्यर्चसे) स्तुति के द्वारा पूजित कर (सूर्यामासा चन्द्रमसा) सूर्य और चन्द्रमारूप ज्ञानप्रकाशक और स्नेहप्रसारक (यमम्) जगन्नियन्ता परमात्मा को (दिवि त्रितम्) मोक्षधाम में वर्तमान तथा तीनों लोकों में व्यापक (वातम्) वायु के समान जीवनप्रद (उषसम्-अक्तुम्) जागृतिप्रद और स्नेहप्रद (अश्विना) ज्योतिर्मय और आनन्दरसमय परमात्मा को पूजित कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा समस्त देवों के गुणों से युक्त है। वह मनुष्यों तथा ऋषियों द्वारा स्तुति करने योग्य और साक्षात् करने योग्य है ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महादेव व देवों का उपासन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गय प्लात से ही कहते हैं कि तू (गिरः) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (वा) = निश्चय से उस प्रभु का (अभ्यर्चसे) = स्तवन करता है जो प्रभु (नराशंसम्) = मनुष्यों से शंसन के योग्य हैं, जिनका शंसन मनुष्य को जीवन में प्रेरणा प्राप्त कराता है। (पूषणम्) = जो प्रभु पोषण करनेवाले हैं, प्रभु ही पोषण के सब साधनों को उत्पन्न करनेवाले हैं । (अगोह्यम्) = निराकार होते हुए भी जिनका छिपाना कठिन है, उस प्रभु की महिमा कण-कण में प्रकट होती है, प्रत्येक फूल व तारा प्रभु की महिमा का गायन कर रहा है। (अग्निम्) = वे प्रभु अग्रणी हैं, हमें उन्नतिपथ पर आगे और आगे ले चलते हैं । (देवेद्धम्) = वे देवों से अपने हृदयों में [= प्रकाशित] किये जाते हैं। इन प्रभु का स्तवन हमें जीवन में पथ-प्रदर्शक व सहायक होता है । [२] इन प्रभु का स्तवन करने के लिये ही (सूर्यामासा) = सूर्य की गति से बनाये जानेवाले बारह मासों का मैं स्तवन करता हूँ। इन मासों के स्तवन का स्वरूप यही है कि मैं इस संसार वृक्ष की विशिष्ट शाखा बनूँगा [वि-शाखा] यह संकल्प मुझे ज्येष्ठता प्रदान करेगा [ज्येष्ठा] मैं काम-क्रोध-लोभ से पराभूत न होऊँगा [अ-षाढा] इस अपराभव में ज्ञान का श्रवण मेरा सहायक होगा [ श्रवणा] यह श्रवण ही कल्याण का मार्ग है [भद्र - पदा] इस पर मैं आज से ही चलूँगा [अ-श्विनी] और कामादि शत्रुओं का कर्तन करने लगूँगा [कृत्तिका] आत्मालोचन के द्वारा इन शत्रुओं के अन्वेषण करनेवालों का शिरोमणि बनूँगा [ मृगशिरस् ] बस यही मार्ग मेरा वास्तविक पोषण करेगा [पुष्य] मैं वास्तविक ऐश्वर्य को प्राप्त करूँगा [मघा] इस ऐश्वर्य की तुलना में मुझे सांसारिक ऐश्वर्य तुच्छ जचेगा [ फल्गुनी] यही मेरे जीवन का आश्चर्यजनक कर्म [miracle] होगा [चित्रा] । [३] (चन्द्रमसा) = इन मासों का स्तवन मैं चन्द्रा के साथ करता हूँ। चन्द्रमा से 'चदि आह्लादे' सदा मन की प्रसन्नता का पाठ पढ़ता हूँ । इस मनः प्रसाद के होने पर (दिवियमम्) = प्रकाशमय रूप में स्थित उस नियन्ता प्रभु को याद करता हूँ । मनः प्रसाद के होने पर प्रभु का प्रकाश दिखता ही है। यह प्रकाश हमें जीवन के मार्ग में नियन्त्रित करनेवाला होता है । [४] इस प्रकाश की प्राप्ति के लिये ही हम (त्रितम्) = ज्ञान, कर्म व उपासना तीनों में तीर्णतम [= अत्युच्च स्थिति में स्थित ] पुरुष का आदर करते हैं, आदरपूर्वक उसके समीप उपस्थित होते हैं। इसका सम्पर्क हमारे जीवन को भी उच्च करेगा। [५] (वातम्) = मैं वायु का उपासन करता हूँ, (उषसम्) = उषा का उपासन करता हूँ और (अश्विना) = प्राणापानों का उपासन करता हूँ। वायु की तरह सतत क्रियाशील जीवनवाला बनता हूँ। उषा की तरह अज्ञानान्धकार का दहन करनेवाला होता हूँ। प्राणापान के द्वारा प्राणसाधना करता हुआ मैं उल्लिखित सब देवों व परमदेव का उपासक बन पाता हूँ। उपासना के लिये आवश्यक चित्तवृत्ति का निरोध प्राणसाधना से ही तो होना है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम परमदेव के दर्शन के लिये सूर्य, चन्द्र, वायु व उषा आदि देवों का उपासन करते हैं, इनकी विशेषताओं को अपने जीवनों में धारण करते हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वा) अथ च (नराशंसम्) नरैर्मनुष्यैः प्रशंसनीयं (पूषणम्) पोषयितारं (अगोह्यम्-अग्निम्) प्रत्यक्षीकरणीयमग्निरूपं परमात्मानं (देवेद्धम्) देवैर्विद्वद्भिः स्वान्तरात्मनि साक्षात्करणीयं परमात्मानं (गिरा-अभ्यर्चसे) स्तुत्या खल्वभिष्टुहि (सूर्यमासा चन्द्रमसा) सूर्याचन्द्रमसौ-सूर्यचन्द्रौ-सूर्यचन्द्राविव ज्ञानप्रकाशस्नेहप्रसारकं तं परमात्मानं (यमम्) जगन्नियन्तारं (दिवि त्रितम्) मोक्षधाम्नि वर्तमानं त्रिषु लोकेषु ततं व्यापकं (वातम्) वात इव जीवनप्रदस्तं (उषसम्-अक्तुम्) जागृतिप्रदं स्नेहप्रदं परमात्मानं (अश्विना) ज्योतिर्मयमानन्दरसमयं च पूजय ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O man, with holy words worship the divine spirit adored by humanity, study, honour and celebrate Pusha, divine unfathomable source of nourishment, Agni present in direct experience and lighted by noble and brilliant yajakas, sun and moon and their relative monthly movements, the heavenly energy operative in the three regions of the sun, sky and the earth, the dawn, the night and day and the Ashvins, complementary dynamics of natural energy in motion.