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ए॒वा क॒विस्तु॑वी॒रवाँ॑ ऋत॒ज्ञा द्र॑विण॒स्युर्द्रवि॑णसश्चका॒नः । उ॒क्थेभि॒रत्र॑ म॒तिभि॑श्च॒ विप्रोऽपी॑पय॒द्गयो॑ दि॒व्यानि॒ जन्म॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā kavis tuvīravām̐ ṛtajñā draviṇasyur draviṇasaś cakānaḥ | ukthebhir atra matibhiś ca vipro pīpayad gayo divyāni janma ||

पद पाठ

ए॒व । क॒विः । तु॒वि॒ऽरवा॑न् । ऋ॒त॒ऽज्ञाः । द्र॒वि॒ण॒स्युः । द्रवि॑णसः । च॒का॒नः । उ॒क्थेभिः॑ । अत्र॑ । म॒तिऽभिः॑ । च॒ । विप्रः॑ । अपी॑पयत् । गयः॑ । दि॒व्यानि॑ । जन्म॑ ॥ १०.६४.१६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:64» मन्त्र:16 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:8» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:16


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एव) इस प्रकार (कविः) मेधावी (तुवीरवान्) बहुत ज्ञान ऐश्वर्य्यवाला (ऋतज्ञाः) सत्य तत्त्व का जाननेवाला (द्रविणस्युः) मोक्ष धन का इच्छुक (द्रविणसः-चकानः) विविध धन की कामना करनेवाला (अत्र-उक्थेभिः-च मतिभिः) इस जन्म में स्तुतियों तथा मन्त्रवचनों के द्वारा (विप्रः) अपने को विशेषरूप से तृप्त करनेवाला (गयः-दिव्यानि जन्म-अपीपयत्) प्राणवान् होता हुआ मोक्षविषयक सुखमय स्थानों को बढ़ाता है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - मेधावी विद्वान् ज्ञान ऐश्वर्य से सम्पन्न होकर संसार में विविध सम्पत्ति को चाहता हुआ उपार्जित तथा प्राप्त करता है। उससे अपने को तृप्त करता हुआ योग्य आचरणवाला होकर मोक्षसुखों का अधिकारी बनता है ॥१६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिव्यता का विकास

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एवा) = गत मन्त्र में वर्णित प्रकार से (गयः) = प्राणों का रक्षक [गयाः प्राणाः] प्राणसाधना करनेवाला 'गय' (कविः) = कान्तप्रज्ञ बनता है, सृष्टि के पदार्थों के तत्त्वज्ञान को प्राप्त करता है। (तुवीरवान्) = [तुवि + ईर+वान् ] हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणा को खूब ही सुनता है, बहुत प्रेरणावाला होता है । (ऋतज्ञाः) = ऋत को जाननेवाला, यज्ञों [ऋत यज्ञ] को समझनेवाला अथवा बड़े नियमित कार्यक्रमवाला होता है । (द्रविणस्युः) = संसार- यात्रा के साधक द्रविणों को चाहनेवाला और उन द्रविणों के उत्तम उपयोग के द्वारा वह (द्रविणसः चकानः) = उन द्रविणों को दीप्त करनेवाला होता है [ कन् दीप्तौ ] । इन धनों से उसकी शोभा बढ़ती ही है। प्रभु स्मरण के कारण व प्रभु-प्रेरणा को सुनने के कारण इन धनों से यह वासनामय जगत् में नहीं पहुँच जाता, वैषयिक वृत्ति का न बनकर इनको वह जीवनयात्रा को पूर्ति का साधन मात्र ही जानता है। [२] इस प्रकार (अत्र) = इस जीवन में (गयः) = यह प्राणसाधक पुरुष (उक्थेभिः) = प्रभु के स्तोत्रों के द्वारा (च) = और (मतिभिः) = मननों के द्वारा प्रत्येक पदार्थ में प्रभु की महिमा को देखने के द्वारा (विप्र:) = अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाला बनता है और (दिव्यानि जन्म) = दिव्य प्रादुर्भावों व विकासों का (अपीपयत्) = वर्धन करता है । अपने अन्दर दिव्यता का अधिकाधिक विकास करनेवाला होता है। प्रभु का स्तवन व मनन करता हुआ यह बहुत कुछ प्रभु जैसा ही बनता जाता है। प्रभु जैसा बनना ही तो जीवन का लक्ष्य है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु स्तवन व मनन के द्वारा हम अपने जीवनों में दिव्यता का विकास करें ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एव) एवं (कविः) मेधावी “कविः-मेधाविनाम” [निघ० ३।१५] (तुवीरवान्) बहुज्ञानैश्वर्यवान् (ऋतज्ञाः) सत्यतत्त्वज्ञः (द्रविणस्युः) मोक्षधनस्येच्छुकः (द्रविणसः-चकानः) विविधधनस्य कामयमानः “चकानः कामयमानः” [ऋ०  ३।५।२ दयानन्दः] (अत्र उक्थेभिः-च मतिभिः) अस्मिन् जन्मनि स्तुतिभिर्मन्त्रवचनैश्च (विप्रः) आत्मानं विशिष्टतया तर्पयिता (गयः-दिव्यानि जन्म-अपीपयत्) प्राणवान् सन् “प्राणा वै गयाः” [श० १४।८।१५।७] ‘मतुब्लोपश्छान्दसः’ दिवि भवानि मोक्षविषयकाणि सुखमयानि स्थानानि वर्धयति ॥१६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus does the poetic visionary, celebrant of divinities and the divine Word, vibrant devotee of the laws of Truth, worshipper of the highest wealth of Divinity, lover of the wealth and values of existence, with thoughts, words and songs of piety in a state of inspiration and ecstasy serve and celebrate the divinities here in the congregation of the learned in this life.