पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एवा) = गत मन्त्र में वर्णित प्रकार से (गयः) = प्राणों का रक्षक [गयाः प्राणाः] प्राणसाधना करनेवाला 'गय' (कविः) = कान्तप्रज्ञ बनता है, सृष्टि के पदार्थों के तत्त्वज्ञान को प्राप्त करता है। (तुवीरवान्) = [तुवि + ईर+वान् ] हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणा को खूब ही सुनता है, बहुत प्रेरणावाला होता है । (ऋतज्ञाः) = ऋत को जाननेवाला, यज्ञों [ऋत यज्ञ] को समझनेवाला अथवा बड़े नियमित कार्यक्रमवाला होता है । (द्रविणस्युः) = संसार- यात्रा के साधक द्रविणों को चाहनेवाला और उन द्रविणों के उत्तम उपयोग के द्वारा वह (द्रविणसः चकानः) = उन द्रविणों को दीप्त करनेवाला होता है [ कन् दीप्तौ ] । इन धनों से उसकी शोभा बढ़ती ही है। प्रभु स्मरण के कारण व प्रभु-प्रेरणा को सुनने के कारण इन धनों से यह वासनामय जगत् में नहीं पहुँच जाता, वैषयिक वृत्ति का न बनकर इनको वह जीवनयात्रा को पूर्ति का साधन मात्र ही जानता है। [२] इस प्रकार (अत्र) = इस जीवन में (गयः) = यह प्राणसाधक पुरुष (उक्थेभिः) = प्रभु के स्तोत्रों के द्वारा (च) = और (मतिभिः) = मननों के द्वारा प्रत्येक पदार्थ में प्रभु की महिमा को देखने के द्वारा (विप्र:) = अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाला बनता है और (दिव्यानि जन्म) = दिव्य प्रादुर्भावों व विकासों का (अपीपयत्) = वर्धन करता है । अपने अन्दर दिव्यता का अधिकाधिक विकास करनेवाला होता है। प्रभु का स्तवन व मनन करता हुआ यह बहुत कुछ प्रभु जैसा ही बनता जाता है। प्रभु जैसा बनना ही तो जीवन का लक्ष्य है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु स्तवन व मनन के द्वारा हम अपने जीवनों में दिव्यता का विकास करें ।