होत्रा - मन तथा सप्त होता [वे आदित्य]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (समिद्धाग्निः) = दीप्त ज्ञानाग्निवाले (मनुः) = ज्ञानपुञ्ज प्रभु (येभ्यः) = जिनके लिये (प्रथमां होत्रान्) = सृष्टि के प्रारम्भ में उच्चारण की जानेवाली ज्ञान की वाणी [नि० १ । ११] को (आयेजे) = संगत करते हैं । (मनसः) = मनन शक्ति के साथ तथा (सप्त होतृभिः) = 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' = कर्णादि सात होताओं के साथ प्रभु जिन्हें ज्ञान प्राप्त कराते हैं (ते) = वे (आदित्यः) = ज्ञान का आदान करनेवाले ज्ञानी मननशील ऋषि (अभयम्) = निर्भयता व (शर्म) = सुख को यच्छत दें और (नः) = हमारे लिये (सुपथा) = उत्तम मार्गों को (सुगा) = सुगमता से जाने योग्य (कर्त) = करें। जिससे (स्वस्तये) = हमारी जीवन की स्थिति उत्तम हो । [२] प्रभु सृष्टि के प्रारम्भ में 'अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा' इन ऋषियों को वेदज्ञान प्राप्त कराते हैं। अब भी निर्मल हृदय होकर हम उस प्रकाश को देख सकते हैं। प्रभु जहाँ ज्ञान प्राप्त कराते हैं, वहाँ मनन साधन 'मन' को भी प्राप्त कराते हैं, उस मनन के लिये सामग्री को प्राप्त कराने के लिये 'दो कान, दो नासिकाछिद्र, दो चक्षु व वाणी' रूप सप्त [ऋषियों] को भी प्राप्त कराते हैं। इस प्रकार मन, इन्द्रियों व वेदवाणी द्वारा अपने ज्ञान का वर्धन करनेवाले ये व्यक्ति 'आदित्य' हैं। इन आदित्यों के सम्पर्क में हमें निर्भयता व सुख प्राप्त होता है । ये आदित्य हमें ज्ञान देकर सुपथ से चलने की प्रेरणा प्राप्त कराते हैं। इस सुपथ से चलते हुए हमारा जीवन 'स्वस्ति-मय' होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञानियों से ज्ञान प्राप्त करके हम सुपथ से चलें और स्वस्ति को प्राप्त करें।