पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तान्) = उन (आदित्यान्) = सब स्थानों से अच्छाइयों का ग्रहण करनेवाले देवों के (अनु) = पीछे चलते हुए हम (मदा) = हर्ष का अनुभव करते हैं, जिससे (स्वस्तये) = [सु+अस्ति ] हम जीवन की स्थिति को उत्तम बना सकें। आदित्यों का अनुगमन करते हुए हम भी गुणों के आदान की वृत्तिवाले बनेंगे, तो हमारी स्थिति उत्तम बनेगी ही । [२] उन आदित्यों का हम अनुगमन करते हैं (येभ्यः) = जिनके लिये (माता) = वेद-माता (मधुमत् पयः) = माधुर्य से पूर्ण ज्ञानदुग्ध को (पिन्वते) = प्राप्त कराती है । 'स्तुता मया वरदा वेदमाता० ' इन वेद शब्दों में वेद को माता कहा ही है। माता जैसे दूध से बच्चे का पोषण करती है, इसी प्रकार यह वेदमाता ज्ञानदुग्ध से हमारा पोषण करती है । वेदमाता का यह ज्ञानदुग्ध माधुर्य से परिपूर्ण है। वेद में माधुर्य पर अत्यधिक बल दिया है। वेद का ज्ञान मनुष्य के जीवन को द्वेषादि से ऊपर उठाकर मधुर बनाता है। [३] हम उन देवों के सम्पर्क में आयें जिनके लिये (द्यौः) = द्युलोक, अर्थात् मस्तिष्क (पीयूषम्) = अमृत का वर्षण करता है । मस्तिष्कस्थ सहस्रार चक्र में जिस समय प्राणों का संयम होता है उस समय धर्ममेघ समाधि की स्थिति में अमृत बिन्दुवर्षण होता है जो कि योगी के अनिर्वचनीय आनन्द का कारण बनता है । (अदिति:) = हृदयान्तरिक्ष [अदितिरन्तरिक्षम् ] (अद्रिबर्हाः) = अविदारणीय [अ+दृ] अथवा आदरणीय प्रभु का वर्धन करनेवाला होता है। इन देवों के हृदय में प्रभु की भावना का उत्कर्ष होता है, यह प्रभु-दर्शन ही वस्तुतः इन्हें पवित्र व शान्त जीवनवाला बनाता है। [४] हम उन देवों के सम्पर्क में आयें जो (उक्थशुष्मान्) = स्तोत्रों के बलवाले हैं, प्रभु के स्तवन से प्रभु के सम्पर्क में आकर जो प्रभु के बल से बलवाले होते हैं। (वृषभरान्) = जो अपने अन्दर धर्म की भावना को भरते हैं तथा (स्वप्नस:) = [अप्रस्-कर्म] उत्तम कर्मवाले हैं। इन देवों के सम्पर्क में आकर हम भी 'स्तुतिशील, धार्मिक व उत्तम यज्ञादि कर्मों के करनेवाले' बनेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उन देवों के सम्पर्क में आयें जो कि 'स्तुतिशील धार्मिक व कर्मनिष्ठ' हैं तथा जो वेदज्ञान को प्राप्त करते हैं, समाधि के अभ्यस्त हैं, प्रभु का हृदय में दर्शन करनेवाले हैं।