पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एवा) = गत मन्त्रों में वर्णित प्रकार से (प्लतेः सूनुः) = प्लति का पुत्र, (विश्वे आदित्याः) = सब देवो! और (अदिते) = अदीने देवमातः ! (वः) = आप सबका (अवीवृधत्) = वर्धन करता है। 'प्रा पूरणेधातु से ति प्रत्यय करके, प्रा को ह्रस्व होने से प्रति शब्द बनता है, इस में र को ल होकर प्लति हो गया है। यह शरीर व मन के दृष्टिकोण से अपना पूरण करनेवाला है। इसी भाव पर बल देने के लिये उसे यहां 'प्लति का सूनु' कहा है। अपना पूरण करनेवाला व्यक्ति देवों व देवमाता का स्तवन करता है और इस प्रकार उन देवों को अपने में धारण करने का प्रयत्न करता है । दिव्यगुणों को धारण करने के लिये ही वह अदीना देवमाता का भी स्तवन करता है। यह अपने जीवन में भौतिक पदार्थों के लिये लालायित नहीं होता और इसीलिये इसे इन पदार्थों की प्राप्ति के लिये कहीं दीनतापूर्वक गिड़गिड़ाना नहीं होता। यह आत्मसम्मान के साथ जीवन यापन कर पाता है । वस्तुतः यही व्यक्ति (मनीषी) = मनीषा व बुद्धिवाला है। बुद्धि का मार्ग यही है कि मनुष्य दिव्यगुणों को धारण करने का प्रयत्न करे, भौतिक वस्तुओं को जीवन में प्रधानता न दे। इन्हीं की प्राप्ति के लिये मनुष्य को आत्मसम्मान खोना पड़ता है। [२] जब मनुष्य इन भौतिक वस्तुओं में नहीं उलझते तभी उस (अमर्त्येन) = अमरणधर्मा अविनाशी प्रभु के साथ चलते हुए (नरः) = उन्नतिपथ पर बढ़नेवाले ये मनुष्य (ईशानासः) = ईशान होते हैं । प्रभु के मेल से इन्हें शक्ति प्राप्त होती है । इस अमर्त्य प्रभु से मेल के लिये ही (गयेन) = [गयाः प्राणाः] प्राकृतिक वस्तुओं में न उलझने से प्राणशक्ति के पुंज बने हुए इस 'गय' से (दिव्यः जनः) = उस देव की ओर चलनेवाले लोग (अस्तावि) = स्तुत होते हैं । इन दिव्य जनों का स्तवन करके ये भी दिव्य बनने का प्रयत्न करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - दिव्य जनों का स्तवन करते हुए हम भी दिव्य बनें। उस प्रभु से मेल होने पर हम भी ईशान बन सकेंगे। सूक्त का प्रारम्भ देव पुरुष के तीन लक्षणों के प्रतिपादन से हुआ है, [१] समाप्ति पर प्रभु से मिलकर ईशान बनने का संकल्प वर्णित हुआ है, [१७] प्रभु से मेल के लिये ही 'गय प्लात' प्रभु के नाम का स्मरण करता है-