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अपामी॑वा॒मप॒ विश्वा॒मना॑हुति॒मपारा॑तिं दुर्वि॒दत्रा॑मघाय॒तः । आ॒रे दे॑वा॒ द्वेषो॑ अ॒स्मद्यु॑योतनो॒रु ण॒: शर्म॑ यच्छता स्व॒स्तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

apāmīvām apa viśvām anāhutim apārātiṁ durvidatrām aghāyataḥ | āre devā dveṣo asmad yuyotanoru ṇaḥ śarma yacchatā svastaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अप॑ । अमी॑वाम् । अप॑ । विश्वा॑म् । अना॑हुतिम् । अप॑ । अरा॑तिम् । दुः॒ऽवि॒दत्रा॑म् । अ॒घ॒ऽय॒तः । आ॒रे । दे॒वाः॒ । द्वेषः॑ । अ॒स्मत् । यु॒यो॒त॒न॒ । उ॒रु । नः॒ । शर्म॑ । य॒च्छ॒त॒ । स्व॒स्तये॑ ॥ १०.६३.१२

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:63» मन्त्र:12 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:5» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:12


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे विद्वानो ! (विश्वाम्) सब (अमीवाम्) रोगस्थिति को (अप) दूर करो (अनाहुतिम्-अप) अप्रार्थना-नास्तिकता को दूर करो (अरातिम्-अप) अदानभावना को दूर करो (दुर्विदत्राम्-अप) दुष्टानुभूति-भ्रान्ति को दूर करो (अघायतः) हमारे प्रति पाप चाहनेवाले शत्रुओं को दूर करो (द्वेषः-अस्मत्-आरे युयोतन) द्वेषभाव को हमसे दूर करो (नः-उरु शर्म स्वस्तये यच्छत) हमारे लिए-हमें बड़ा सुख कल्याणार्थ प्रदान करो ॥१२॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों से आत्मिक मानसिक शारीरिक दोषों को दूर करने के लिए नम्र प्रार्थना करनी चाहिए, जिससे सब प्रकार की सुख शान्ति और निरोगता प्राप्त हो सके ॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रोग व द्वेष से दूर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे देवो! आप अपने ज्ञानोपदेश के द्वारा (अमीवाम्) = रोगों को (अप) = हमारे से दूर करिये। हमारे शरीर रोगों से रहित हों । (विश्वाम्) = सब (अनाहुतिम्) = न यज्ञ करने की भावना को [हु] अथवा विद्वानों को न पुकारने की भावना को [ह्वा] हमारे से दूर करिये (अरातिम्) = [अ रा=दाने] न दान देने की भावना को अथ हमारे से दूर करिये । (अघायतः) = दूसरे के अघ व पाप [अशुभ] की कामनावाले पुरुष की (दुर्विदत्राम्) = दुर्बुद्धि को, दुष्टज्ञान को हमारे से दूर करिये। [२] हे (देवाः) = ज्ञान देनेवाले पुरुषो! (द्वेषः) = द्वेष को (अस्मत्) = हमारे से आरे दूर (युयोतन) = पृथक् करिये । ईर्ष्या-द्वेष की भावनाएँ हमारे समीप न आएँ। और इस प्रकार ईर्ष्या-द्वेष से ऊपर उठाकर (नः) = हमारे लिये (उरु शर्म) = विस्तृत सुख को यच्छता प्राप्त कराइये जिससे स्वस्तये हमारे जीवन की स्थिति उत्तम हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम देवों से ज्ञान को प्राप्त करें, यह ज्ञान हमें नीरोग, निर्लोभ व निद्वेष बनाये ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे विद्वांसः ! (विश्वाम्) सर्वां (अमीवाम्) रोगस्थितिं (अप) दूरं प्रेरयत (अनाहुतिम्-अप) अप्रार्थनां दूरं कुरुत (अरातिम्-अप) अदानभावनां दूरं क्षिपत (दुर्विदत्राम्-अप) दुष्टानुभूतिं भ्रान्तिं दूरं प्रक्षिपत (अघायतः) पापमिच्छतः शत्रून् दूरं क्षिपत (द्वेषः-अस्मत्-आरे युयोतन) द्वेषभावान्-अस्मत्तो दूरे प्रेरयत (नः-उरु शर्म स्वस्तये यच्छत) अस्मभ्यं महत् सुखं कल्याणाय प्रयच्छत ॥१२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Brilliant divinities of nature and humanity, pray remove all sickness and disease of the world, eliminate indifference and opposition to divine service, remove selfishness and miserliness, remove the malignance of the sinner souls, throw off hate and jealousy far from us and give us a spacious peaceful happy home so that we may live the good life with happiness and all round well being.