पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो (अग्नेः) = उस प्रभु से परिजज्ञिरे शक्तियों के विकास को प्राप्त करते हैं, वे (विरूपासः) = विशिष्टरूपवाले तो होते ही हैं। ये (दिवः परि) = [परेर्वर्जने] द्युलोक से भी परे पहुँचते हैं । द्युलोक को छोड़कर द्युलोक से ऊपर उठते हैं। पृथ्वीलोक से ऊपर उठकर ये अन्तरिक्ष में आरुढ़ हुए, अन्तरिक्ष से ऊपर उठकर द्युलोक में पहुँचे और द्युलोक से भी ऊपर उठकर इन्होंने स्वर्ज्योति को प्राप्त किया है 'पृष्ठात् पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहं, अन्तरिक्षादिवमारुहं, दिवो नाकस्य पृष्ठात् स्वर्ज्योतिरगामहम्'। शरीर, मन व मस्तिष्क की उन्नति करके ये प्रभु को प्राप्त करनेवाले हुए हैं। [२] यह व्यक्ति (नवग्वः) = [नवग्व शब्द पर्यन्तं गच्छति] आयु के नौवें दशक तक जानेवाला होता है, (नु दशग्वः) = निश्चय से दशवें दशक तक पहुँचनेवाला होता है। अर्थात् ९० व १०० वर्ष तक आयुष्यवाला होता है। इस आयुष्य में भी यह (अंगिरस्तमः) = अधिक से अधिक सरस अंगोंवाला होता है। (सचा देवेषु) = यह सदा देवों में साथ रहनेवाला होता है । अर्थात् सूर्यादि देव इसके अक्षि आदि स्थानों में ठीक प्रकार निवास करते हैं 'सूर्यः चक्षुर्भूत्वा अक्षिणी प्राविशत् 'सूर्य चक्षु बनकर आँखों में रहता है तो चन्द्रमा मन बनकर हृदय में निवास करता है, वायु प्राण बनकर नासिका में, अग्नि वाणी बनकर मुख में, दिशाएँ श्रोत्र बनकर कानों में रहती हैं। इस प्रकार यह विरूप सब देवों के साथ रहता है 'सर्वा ह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठ इवासते' । [२] इस प्रकार सब देवों के साथ रहता हुआ यह देवों की सब से बड़ी विशेषता को धारण करता है और (मंहते) = खूब देनेवाला होता है। यह त्याग इसके जीवन को उत्कृष्ट बनाये रखता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के उपासन से हम द्युलोक से परे स्वर्ज्योति को प्राप्त करनेवाले बनें। नब्बे व सौ साल की उमर में भी सरस अंगोंवाले हों। देवों के साथ निवास करते हुए त्यागशील हों ।