सभा-भंग व नये चुनाव के समय शक्ति कहाँ ?
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (कर्तं मध्या अभवत्) = अपने कार्य के बीच में ही होती है, अर्थात् सभी किन्हीं कानूनों पर विचार कर रही हो वह विचार पूर्ण न हुआ हो तो भी (अभीके) = [at the right time, just in time] ठीक समय पर, अर्थात् सभा के समय की अवधि के समाप्त होने पर (पितरि) = राष्ट्र के पिता [= रक्षक] राजा के (युवत्याम्) = उस युवति सभा में (कामं कृण्वाने) = अपनी सभाभंग रूप इच्छा को करने पर, ये (वियन्ता) = भंग होती हुई सभाएँ [ सभा व समिति ] (रेतः) = शक्ति को (मनानक्) = थोड़ा-सा थोड़ी देर के लिये (जहतुः) = छोड़ देती हैं । [२] इस चुनाव के काल में यह शक्ति (सानौ) = शिकर में राष्ट्र के सर्वोच्च व्यक्ति राष्ट्रपति में (निषिक्तम्) = सिक्त होती है, जो राष्ट्रपति (सुकृतस्य योनौ) = सुकृत का योनि है, सदा उत्तम ही कार्यों का करनेवाला है, जिससे यही आशा की जाती है कि वह गलत कार्य कर ही नहीं सकता [ a king can do no wrors] [३] सभा को यहां युवति कहा गया है। वस्तुतः प्रति चतुर्थ या पंचम वर्ष में फिर से चुनाव हो जाने के कारण सभा के वृद्ध हो जाने का प्रश्न ही नहीं होता। यह सदा युवति बनी रहती है । राष्ट्रपति चुनाव कराता है सो वह इस युवति का पिता कहा गया है। इस युवति में ही वह पिता शक्ति का स्थापन कर देता है, सभा ही तो राष्ट्र का संचालन करती है। चुनाव के अल्पकाल में यह शक्ति फिर से उस पिता में, जो कि राष्ट्र रूप गृह में सर्वोच्च व्यक्ति है, और जिससे यह आशा की जाती है कि वह जो कुछ करेगा ठीक ही करेगा, स्थापित होती है । [४] यहाँ यह संकेत स्पष्ट है कि चुनाव सभा व मन्त्रिमण्डल नहीं कराते । उनका भंग होकर राष्ट्रपति ही चुनाव की व्यवस्था करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- चुनाव ठीक समय पर हो ही जाने चाहिएँ। सभा का कोई कार्य अधूरा भी हो तो सभाभंग होकर नया चुनाव हो ही जाना चाहिए, नयी सभा उस कार्य को पूर्ण कर लेगी। चुनाव के समय सारी शक्ति राष्ट्रपति में निहित होनी चाहिए।