राष्ट्रपति [नर्यः - अनर्वा]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार जो व्यक्ति शरीर व मन को अधिक से अधिक स्वस्थ बनाता है वह राष्ट्रपति होने के योग्य होता है। इसका पहला कार्य विधान का निर्माण होता है । (यस्य) = जिस राष्ट्रपति का (वीरकर्मम्) = विधान निर्माण रूप वीरता का काम (प्रथिष्ट) = प्रथित प्रसिद्ध होता है। यह कार्य ही वस्तुत: सब से अधिक आवश्यक व कठिन होता है। [२] यह विधान (अनुष्ठितम्) = क्रिया में अनूदित हुआ हुआ (इष्णत्) = [to impel promote] राष्ट्र को उन्नत करनेवाला होता है, लोगों को उन्नति के पथ पर आगे ले चलता है । (नु) = अब विधान के बन जाने पर (नर्यः) = यह लोकहित कर्ता राष्ट्रपति (अपौहत्) = [ऊह् = to remone] सब कमियों को दूर करता है। विधान के अनुसार राष्ट्र का संचालन करता हुआ यह लोक-जीवन को सुखी बनाने का प्रयत्न करता है। राष्ट्र में 'सुख, शान्ति व समृद्धि' को बढ़ाना इसका उद्देश्य होता है। [३] इस विधान के अनुसार राष्ट्र संचालन के लिये यह (अनर्वा) = लोगों को हिंसित न करनेवाला राष्ट्रपति अपनी शक्ति को सभा व समिति में स्थापित करता है। ये सभा व समिति राष्ट्रपति की पूरिका होने से 'दुहिता' [दुह प्रपूरणे] कहलाती हैं, ये शक्ति को प्राप्त करके चमकती हैं सो 'कना' [कन् दीप्तौ] हैं। राष्ट्रपति के द्वारा बनायी जाने के कारण ये उसकी कन्याएँ ही हैं । (यत्) = जो शक्ति (कनायाः) = इस चमकनेवाली (दुहितुः) = राष्ट्रपति की पूरिका सभा व समिति में (अनुभृतम्) = स्थापित (आः) = [ आसीत् ] थी, (तत्) = उस शक्ति को यह (अनर्वा) = राष्ट्र की हिंसा न होने देनेवाला राष्ट्रपति ४ या ५ वर्ष के निश्चित समय के समाप्त होने पर (पुनः) = फिर (आवृहति) = [उपच्छति] उस सभा से ले लेता है। सभा की शक्ति को समाप्त करके सभाभंग कर देता है और नया चुनाव कराता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राष्ट्रपति 'नर्य व अनर्वा' होना चाहिये। यह विधान का निर्माण करके सभा व समिति द्वारा राष्ट्र का संचालन करता है। सभा को राष्ट्रपति की शक्ति प्राप्त हो जाती है। निश्चित अवधि के पूर्ण होने पर राष्ट्रपति सभा से शक्ति को वापिस लेकर नये चुनाव के लिये सभा भंग कर देता है।