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प्रथि॑ष्ट॒ यस्य॑ वी॒रक॑र्ममि॒ष्णदनु॑ष्ठितं॒ नु नर्यो॒ अपौ॑हत् । पुन॒स्तदा वृ॑हति॒ यत्क॒नाया॑ दुहि॒तुरा अनु॑भृतमन॒र्वा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prathiṣṭa yasya vīrakarmam iṣṇad anuṣṭhitaṁ nu naryo apauhat | punas tad ā vṛhati yat kanāyā duhitur ā anubhṛtam anarvā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रथि॑ष्ट । यस्य॑ । वी॒रऽक॑र्मम् । इ॒ष्णत् । अनु॑ऽस्थितम् । नु । नर्यः॑ । अप॑ । औ॒ह॒त् । पुन॒रिति॑ । तत् । आ । वृ॒ह॒ति॒ । यत् । क॒नायाः॑ । दु॒हि॒तुः । आः । अनु॑ऽभृतम् । अ॒न॒र्वा ॥ १०.६१.५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:61» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:26» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य वीरकर्मम्-प्रथिष्ट) जिस गृहस्थ का पुत्रकर्म-पुत्रोत्पादनार्थ कर्म वीर्यसेचन प्रथित-पुष्ट होता है (इष्णत्-अनुष्ठितम्) पुत्ररूप से प्राप्त सफलीभूत को (पुनः-तत् आवृहति) फिर उसको वह भलीभाँति उत्साहित करता है पुत्रोत्पादन द्वारा (नु नर्यः-अपौहत्) नरों का अवश्य हितकर होता हुआ सब कार्यभार को त्याग दे (यत्) जिससे कि (कनायाः दुहितुः-अनुभृतम्-आस्) सन्तान दोहन योग्य-उत्पादन योग्य कान्ता की अनुकूलता में धारण किया है (अनर्वा) अपने में समर्थ स्वाश्रयवाला हो जाता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ का लक्ष्य सन्तान उत्पादन करना है, तदर्थ वीर्यसेचन करने पर कमनीय सन्तान को दोहनेवाली पत्नी में वह पुष्ट होकर सन्तान के रूप में उत्पन्न हो जाता है और वह युवा बन जाता है। तब पिता उसे पुत्र परम्परा चलाने के लिए उत्साहित करता है। जब वह पुत्र पुत्रवान् बन जाता है, तो फिर उसका पिता गृहस्थ को त्याग दे अन्य मनुष्यों के हितकार्य करने के लिए ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

राष्ट्रपति [नर्यः - अनर्वा]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार जो व्यक्ति शरीर व मन को अधिक से अधिक स्वस्थ बनाता है वह राष्ट्रपति होने के योग्य होता है। इसका पहला कार्य विधान का निर्माण होता है । (यस्य) = जिस राष्ट्रपति का (वीरकर्मम्) = विधान निर्माण रूप वीरता का काम (प्रथिष्ट) = प्रथित प्रसिद्ध होता है। यह कार्य ही वस्तुत: सब से अधिक आवश्यक व कठिन होता है। [२] यह विधान (अनुष्ठितम्) = क्रिया में अनूदित हुआ हुआ (इष्णत्) = [to impel promote] राष्ट्र को उन्नत करनेवाला होता है, लोगों को उन्नति के पथ पर आगे ले चलता है । (नु) = अब विधान के बन जाने पर (नर्यः) = यह लोकहित कर्ता राष्ट्रपति (अपौहत्) = [ऊह् = to remone] सब कमियों को दूर करता है। विधान के अनुसार राष्ट्र का संचालन करता हुआ यह लोक-जीवन को सुखी बनाने का प्रयत्न करता है। राष्ट्र में 'सुख, शान्ति व समृद्धि' को बढ़ाना इसका उद्देश्य होता है। [३] इस विधान के अनुसार राष्ट्र संचालन के लिये यह (अनर्वा) = लोगों को हिंसित न करनेवाला राष्ट्रपति अपनी शक्ति को सभा व समिति में स्थापित करता है। ये सभा व समिति राष्ट्रपति की पूरिका होने से 'दुहिता' [दुह प्रपूरणे] कहलाती हैं, ये शक्ति को प्राप्त करके चमकती हैं सो 'कना' [कन् दीप्तौ] हैं। राष्ट्रपति के द्वारा बनायी जाने के कारण ये उसकी कन्याएँ ही हैं । (यत्) = जो शक्ति (कनायाः) = इस चमकनेवाली (दुहितुः) = राष्ट्रपति की पूरिका सभा व समिति में (अनुभृतम्) = स्थापित (आः) = [ आसीत् ] थी, (तत्) = उस शक्ति को यह (अनर्वा) = राष्ट्र की हिंसा न होने देनेवाला राष्ट्रपति ४ या ५ वर्ष के निश्चित समय के समाप्त होने पर (पुनः) = फिर (आवृहति) = [उपच्छति] उस सभा से ले लेता है। सभा की शक्ति को समाप्त करके सभाभंग कर देता है और नया चुनाव कराता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राष्ट्रपति 'नर्य व अनर्वा' होना चाहिये। यह विधान का निर्माण करके सभा व समिति द्वारा राष्ट्र का संचालन करता है। सभा को राष्ट्रपति की शक्ति प्राप्त हो जाती है। निश्चित अवधि के पूर्ण होने पर राष्ट्रपति सभा से शक्ति को वापिस लेकर नये चुनाव के लिये सभा भंग कर देता है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य वीरकर्मम्-प्रथिष्ट) यस्य गृहस्थस्य पुत्रकर्म पुत्रार्थकर्म वीर्यसेचनम् “पुत्रो वै वीरः” [श०  ३।३।१।१२] प्रथितं प्रथते वा (इष्णत्-अनुष्ठितम्) पुत्ररूपेण प्राप्तम् “इष्णन् प्राप्नुवन्” [ऋ० ४।१७।३ दयानन्दः] सेवितं सेवायां सफलीभूतं युवानं (पुनः-तत्-आवृहति) पुनस्तं स समन्तादुद्यच्छति पुत्रोत्पादनेन (नु नर्यः-अपौहत्) नरेभ्यो हितो हितकरः सन् सर्वकार्यभारं त्यजेत् (यत्) यतः (कनायाः-दुहितुः-अनुभृतम्-आस्) कान्तायाः सन्तान-दोहनयोग्यायाः पत्न्याः-आनुकूल्येन धारितमासीत् (अनर्वा) स्वस्मिन् समर्थाऽनन्याश्रमी जातः ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That most expansive creativity and generative vitality of Rudra Prajapati, lord creator, animated and vested in nature, which also is an irresistible human impulse, further expands into life when it is received and borne to maturity by the loving youthful maiden, motherly agent of nature’s innate urge for self- fulfilment.