मनोनिरोध व जीवन का परिपाक
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! [यह शब्द ६१ । ४ से लिया गया है] (न द्रवन्ता) = स्थिर होते हुए आप (येषु हवनेषु) = जिन प्रभु की पुकारों में, प्रभु नाम-स्मरणों में (विपः) = ज्ञानी मेधावी पुरुष के (तिग्मं मनः) = इस तीव्र गतिवाले मन को (शच्या) = प्रज्ञानपूर्वक कर्मों से (वनुथः) = जीत लेते हो [वन्=win]। यहाँ मनोनिरोध के लिये [क] सर्वमुख्य साधन प्राणसाधना को कहा गया है। ये प्राण- स्थिर होते हैं [न द्रवन्ता] तो मन भी स्थिर हो जाता है। [ख] मनोनिरोध के लिये प्रभु का आराधन आवश्यक है [हवनेषु], [ग] कर्मों में लगे रहना भी इसमें सहायक है [शच्या] । इन सभी साधनों को अपनाने पर ही यह तीव्र गतिवाला मन वश में होता है। [२] प्राणसाधना आदि के द्वारा मनोनिरोध करनेवाला मेधावी पुरुष वह है (यः) = जो (शर्याभिः) = [शृ हिंसायाम्] वासनाओं के हिंसन के द्वारा (तुविनृम्णः) = [नृम्ण = strength ] महान् शक्तिवाला होता है और यह मेधावी (अस्य) = इस प्रभु की (गभस्तौ) = ज्ञानरश्मियों में (आदिशम्) = उसके आदेश के अनुसार (आ अश्रीणीत) = सर्वथा अपना परिपाक करता है। शरीर, मन व बुद्धि सभी को बड़ा सुन्दर बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना, प्रभु के आराधन व कर्म में लगे रहने से हम मन को स्थिर करें और प्रभु के आदेश के अनुसार चलते हुए ठीक से अपना परिपाक करें।