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इ॒यं मे॒ नाभि॑रि॒ह मे॑ स॒धस्थ॑मि॒मे मे॑ दे॒वा अ॒यम॑स्मि॒ सर्व॑: । द्वि॒जा अह॑ प्रथम॒जा ऋ॒तस्ये॒दं धे॒नुर॑दुह॒ज्जाय॑माना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

iyam me nābhir iha me sadhastham ime me devā ayam asmi sarvaḥ | dvijā aha prathamajā ṛtasyedaṁ dhenur aduhaj jāyamānā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒यम् । मे॒ । नाभिः॑ । इ॒ह । मे॒ । स॒धऽस्थ॑म् । इ॒मे । मे॒ । दे॒वाः । अ॒यम् । अ॒स्मि॒ । सर्वः॑ । द्वि॒ऽजाः । अह॑ । प्र॒थ॒म॒ऽजाः । ऋ॒तस्य॑ । इ॒दम् । धे॒नुः । अ॒दु॒ह॒त् । जाय॑माना ॥ १०.६१.१९

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:61» मन्त्र:19 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:29» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:19


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मे-इयं नाभिः) मेरी ये परमात्मदेवता या वेदवाणी या प्रज्ञा बाँधनेवाली है (इह मे सधस्थम्) इसमें अन्य जीवन्मुक्तों के साथ मेरा सहस्थान है (इमे मे देवाः) ये मेरे साथ रहनेवाले देवतारूप इन्द्रियाँ हैं (अयं सर्वः-अस्मि) यह मैं आत्मा सब कार्यों में समर्थ हूँ (द्विजाः-अह-ऋतस्य प्रथमजाः) दो अर्थात् माता और पिता से उत्पन्न हुआ अथवा वेदज्ञ आचार्य से और माता-पिता से प्रथम प्रसिद्ध हुआ नित्य आत्मा हूँ (ऋतस्य-इयं जायमाना धेनुः-अदुहत्) अव्यक्त प्रकृति की ये होनेवाली सृष्टि धेनु की भाँति मेरे लिए भोग को दोहती है ॥१९॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा परमा देवता या वेदवाणी अथवा प्रज्ञा मेरा मोक्ष से सम्बन्ध करानेवाली है। अन्य जीवन्मुक्तों के साथ मेरा यह सहस्थान है-समानाश्रय है। मैं आत्मा सब कार्य करने में समर्थ हूँ। सृष्टि में मैं माता-पिता द्वारा प्रसिद्ध होता हूँ। प्रकृति से प्रकटित हुई यह सृष्टि मुझ आत्मा के लिए भोग का दोहन करती है ॥१९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञवेदि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इयम्) = यह यज्ञवेदी ही (मे) = मेरी (नाभिः) = बन्धिका है, यह सारे परिवार के सभ्यों को अपने में बाँधनेवाली है । (इह) = इस यज्ञवेदि में (मे) = मेरा (सधस्थम्) = सारे परिवार के साथ मिलकर बैठना होता है। इस यज्ञवेदि पर बैठे हुए (इमे) = ये मेरे (देवा:) = देव हैं। छोटे-छोटे खेलनेवाले बालक [क्रीडन्ति], शिक्षणालय में स्पर्धा से एक दूसरे को जीतने की कामनावाले विद्यार्थी [विजिगीषा] काम में लगनेवाला युवक [व्यवहार] ज्ञानदीप्त प्रौढ व्यक्ति [द्युति] केवल स्तुति में रत वृद्ध [स्तुति] प्रसन्नता का संचार करनेवाली युवतियाँ [मोद] माद्यन्ती अवस्थावाली द्वितीयाश्रम में प्रवेश के लिये तैयार युवति [मद], गोद में सोया हुआ बच्चा [स्वप्न] नाना प्रकार की कामनाओंवाली किशोरी [कान्ति] और केवल चहल-पहल रखनेवाले सन्तान [गति] ये सब देव हैं। यज्ञवेदि पर इन सबने आसीन होना है । [२] इस प्रकार यज्ञ करता हुआ (अयम्) = यह मैं (सर्वः अस्मि) = पूर्ण होने का प्रयत्न करता हूँ। [सर्व = whole = स्वस्थ ] यह यज्ञ मेरे शरीर को ही नहीं, मन व बुद्धि को भी स्वस्थ बनाता है। (द्विजाः) = [द्वौ जायेते यस्य] मैं शरीर व मस्तिष्क दोनों के विकासवाला बनता हूँ । (अह) = निश्चय से (ऋतस्य) = उस सत्यस्वरूप प्रभु की प्रथमजा सृष्टि के प्रारम्भ में दी गई (धेनुः) = वेदरूप गौ जायमाना=मेरे हृदय में प्रादुर्भूत होती हुई (इदं अदुहत्) = इस ज्ञान का दोहन व पूरण करती है। इस ज्ञान ने ही तो वस्तुतः मुझे 'सर्व' बनाना है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम परिवार में सम्मिलित यज्ञ की प्रथा को अनिवार्य रूप से स्थापित करें। प्रभु की वेदवाणी का अध्ययन करें। यही सर्व पूर्ण स्वस्थ बनने का मार्ग है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मे इयं नाभिः) ममैषा परमात्मदेवता वेदवाक् प्रज्ञा वा नहनी बन्धिकाऽस्ति (इह मे सधस्थम्) अस्यां ममान्यैर्जीवन्मुक्तैः सहस्थानं भवति (इमे मे देवाः) इमे मम सहस्थाने तिष्ठन्तो देवा इन्द्रियाणि (अयं सर्वः-अस्मि) अयं खल्वात्मा सर्वः सकलकार्यसमर्थोऽस्मि (द्विजाः-अह-प्रथमजाः) द्वाभ्यां मातापितृभ्यां यद्वा वेदज्ञात् मातापितृतश्च जातः प्रथमप्रसिद्धो नित्यः-आत्मा (ऋतस्य-इयं जायमाना धेनुः-अदुहत्) ऋतस्याव्यक्तस्य प्रकृतेरियं प्रजायमाना-व्यक्तसृष्टिर्धेनुवन्मह्यं भोगं दोग्धि ॥१९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This is my navel link with life, here is my haven and ultimate home, all these divine brilliancies, winds and pranic energies are mine, here I am all, complete. Whether first bom of divinity or twice born of nature and education, all this universe is born of Prakrti in motion and action under the law of divinity. The divine cow, Vak, nature coming into existential manifestation gives birth to it and to all we need.