कक्षीवान् व अग्नि का दीपन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्राणापान की साधना करनेवाला (अयम्) = यह व्यक्ति (स्तुतः) = [स्तुतं अस्य अस्ति] प्रभु-स्तवन की प्रवृत्तिवाला होता है। (राजा) = [regnlated] व्यवस्थित जीवनवाला होता है और अतएव [राज् दीप्तौ] दमकता है। यह (वन्दि) = लोगों से अभिवादित होता है। इसकी 'उपासनावृत्ति को, व्यवस्थित व दीप्त जीवन को देखकर लोग इसका आदर करते हैं । यह (वेधा:) = [creetor or leerned wan] निर्माण के कार्यों को करनेवाला व ज्ञानी होता है । [२] (अपः च तरति) = सब कार्यों को तैरनेवाला, पार करनेवाला, अन्त तक पहुँचानेवाला होता है [पार कर्मसमाप्तौ ] । यह (विप्रः) = अपना विशेष रूप से पूरण करनेवाला (स्वसेतुः) = आत्मतत्त्व को अपना सेतु बनाता है, भवसागर को पार करने का साधन बनाता है [सेतु-bridge in genorel] [३] (सः) = वह साधक (कक्षीवन्तम्)= [कक्षः = hidig place] गुहा में निवास करनेवाले उस प्रभु को (रेजवत्) = अपने में दीप्त करता है (सः) = वह अग्निम् अपने शरीर के अन्दर निवास करनेवाली वैश्वानर (अग्निम्) = [=जाठराग्नि] को दीप्त करता है। प्राणसाधक जहाँ हृदय को पवित्र करके प्रभु का दर्शन करता है, वहाँ जाठराग्नि को भी दीप्त करता हुआ स्वास्थ्य का पूर्ण विकास करने के लिये यत्नशील होता है। [४] यह साधक (नेमिं न चक्रम्) = परिधि की तरह चक्र को भी दीप्त करता है। शरीर चक्र है, तो त्वचा उसकी नेमि है, शरीर को भी स्वस्थ बनाता है और त्वचा को भी दीप्त रखने का प्रयत्न करता है । (अर्वतः) = इन्द्रिय रूप अश्वों को (रघुद्रु) = लघुगमनवाला बनाता हुआ दीप्त करता है। इसकी इन्द्रियाँ शीघ्रता से अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त होती हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से जीवन उपासनामय व व्यवस्थित बनता है । यह प्राणसाधक स्वस्थ शरीरवाला व प्रभुदर्शन करनेवाला बनता है ।