पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्रों में वर्णित राष्ट्रपति व सभा के सभ्यों ने प्रजा में से ही चुना जाना है, कहीं बाहर से तो इन्होंने आना नहीं । सो प्रत्येक प्रजावर्ग के सभ्य का उत्तम होना आवश्यक है । यह जीवन का उत्कर्ष प्राणसाधना से ही सम्भव है। ये प्राणापान 'नासत्या' हैं, [न असत्या] इनसे जीवन में असत्य नहीं रहता । सो प्रार्थना करते हैं कि हे (इन्द्र) = सब बुराई रूप शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! (उत) = और (त्या) = वे (मे) = मेरे (मासत्या) = प्राणापान रौद्रौ बुराइयों के लिये रुद्ररूप हों, सब बुराइयों का प्रलय करनेवाले हों और वासनाओं का विलय करके ये (अर्चिमन्तौ) = ज्ञान की ज्वालावाले हों। मेरे जीवन में ज्ञान की ज्योति को ये जमानेवाले हों। इस प्रकार ये प्राणापान (गूर्तये) = [गूर्ति: praise स्तुति] स्तुति के लिये हों और (यजध्यै) = यज्ञों के लिये हों। इनकी साधना से मेरा मन प्रभु के स्तवन में लगे तो मेरे हाथ यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त रहें । [२] (मनुष्वत्) = [मनु:-ज्ञानं ] ज्ञानवाले और (वृक्तबर्हिषे) = शुद्धान्तः करणवाले के लिये [वृक्तं बर्हिः येन, हित तस्मै ] (रराणा) = ज्ञान व पवित्रता को देते हुए ये प्राणापान (मन्दू) = आनन्दित करनेवाले हैं, (प्रयसा) = अन्नमयादि सब कोशों में धनों को निहित करनेवाले हैं, [प्रयस्] प्रत्येक कोश का जो भोजन है उसे ये प्राणापान देनेवाले हैं। (विक्षु) = प्रजाओं में ये प्राणापान ही (यज्यू) = यष्टव्य हैं, संगतिकरण योग्य हैं, ये प्राणापान ही पूज्य हैं, इन्हीं की आराधना करनी, ये ही सब कुछ देनेवाले हैं [यज्= देवपूजा, संगतिकरण दान] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणापान ही जीवन का उत्तम निर्माण करनेवाले हैं, सो ये ही यष्टव्य हैं।