पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि हे (सुबन्धो) = मन को बाँधनेवाले ! मन को विषयों में न भटकने देने वाले! (अयम्) = यह यज्ञ ही अथवा प्रभु ही (माता) = तेरी माता हैं, तेरे जीवन का निर्माण करनेवाले हैं, (अयं पिता) = यही तेरे पिता अथवा रक्षण करनेवाले हैं। (अयं जीवातुः) = यह जीवनौषध के रूप में (आगमत्) = तुझे प्राप्त हुए हैं। मन को निरुद्ध करके हम प्रभु में लगाने का प्रयत्न करें, यज्ञादि उत्तम कर्मों में इसे लगाये रखें। हम प्रभु को ही माता, पिता व जीवनोषध के रूप में जानें। [२] हे सुबन्धो ! (इदम्) = यह प्रभु व यज्ञ की ओर चलना ही (तव प्रसर्पणम्) = तेरा प्रकृष्ट मार्ग है । (एहि) = तू इस मार्ग पर चलता हुआ मुझे [प्रभु को ] प्राप्त करनेवाला बन । (निरिहि) = इस विषयपंक से तू बाहर निकल आ । विषयों में फँसे रहकर तेरा विनाश हो जाएगा। यज्ञ में ही तेरा कल्याण है, प्रभु की ओर झुकना ही जीवन है, उससे दूर होकर विषय-प्रवण होना ही मृत्यु है । प्रभु जीव से कहते हैं कि आ जा, विषयों के पंक से बाहिर निकल आ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्रभु को ही माता, पिता व जीवन के रूप में जानें। प्रभु की ओर ही हम चलें। प्रभु को प्राप्त हो जाएँ, विषयों से दूर रहें ।