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आ त॑ एतु॒ मन॒: पुन॒: क्रत्वे॒ दक्षा॑य जी॒वसे॑ । ज्योक्च॒ सूर्यं॑ दृ॒शे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā ta etu manaḥ punaḥ kratve dakṣāya jīvase | jyok ca sūryaṁ dṛśe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । ते॒ । ए॒तु॒ । मनः॑ । पुन॒रिति॑ । क्रत्वे॑ । दक्षा॑य । जी॒वसे॑ । ज्योक् । च॒ । सूर्य॑म् । दृ॒शे ॥ १०.५७.४

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:57» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:4


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे पुत्र ! तेरा मन (पुनः-आ-एतु) पुनः पुनः उत्कृष्टत्व को प्राप्त हो (क्रत्वे दक्षाय जीवसे) कर्म करने, बल पाने और जीवन धारण करने के लिए (ज्योक् सूर्यं दृशे च) और देर तक ज्ञानप्रकाशक परमात्मा को देखने अर्थात् अनुभव करने के लिए ॥४॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ को चाहिए कि अपने पुत्र के मानसिक स्तर को ऊँचा बनाये तथा उसके अन्दर कर्मप्रवृत्ति, शारीरिक शक्ति और जीवनशक्ति दिनों-दिन बढ़ती जाये, इस बात का ध्यान रखें तथा परमात्मा के प्रति आस्तिक भावना और अनुभूति भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाये ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

क्रतु व दक्षं मनोनिरोध के लाभ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु 'सुबन्धु' से कहते हैं कि (ते मनः) = तेरा मन (पुनः) = फिर (आ एतु) = विषयों से निवृत्त होकर हृदय देश में ही प्राप्त हो। इस मन के हृदय में निरुद्ध होने पर ही (क्रत्वे) = तू यज्ञादि उत्तम =तू कर्मों के लिये समर्थ होगा, (दक्षाय) = इन कर्मों के द्वारा अपने बल को बढ़ाने के लिये तू समर्थ होगा । निरुद्ध मन यज्ञादि उत्तम कर्मों को करनेवाला बनता है, इन कर्मों से शक्ति का वर्धन होता है । अथवा ['प्राणो वै दक्षः अपानः क्रतुः तै० सं० २।५२'] मन के निरुद्ध होने पर प्राणापान की शक्ति बढ़ती है । [२] प्राणापान की शक्ति का वर्धन होकर (जीवसे) = तू जीवन के लिये होता है । तेरे में उत्साह व उल्लास होता है। तू मरा-सा प्रतीत नहीं होता। (च) = और उल्लासमय जीवनवाला होकर (ज्योक्) = दीर्घकाल तक (सूर्यं दृशे) = सूर्य के दर्शन के लिये होता है। अर्थात् मनोनिरोध का अन्तिम लाभ दीर्घजीवन है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मनोनिरोध से 'यज्ञशीलता-शक्ति की वृद्धि, उत्साह व उल्लास तथा दीर्घ जीवन' प्राप्त होता है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे पुत्र ! तव मनः (पुनः-आ-एतु) पुनः पुनः उत्कृष्टत्वं प्राप्नोतु (क्रत्वे दक्षाय जीवसे) कर्मकरणाय बलप्रापणाय जीवनधारण-कारणाय (ज्योक् सूर्यं दृशे च) चिरं ज्ञानप्रकाशकं परमात्मानं द्रष्टुं च ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let your mind and spirit arise and be alert again and again, continuously, for noble action, expertise of performance, joyous living, and to see the sun for light and enlightenment for a long long time of health and happiness.