देवता: विश्वेदेवा:
ऋषि: बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च गौपयाना लौपयाना वा
छन्द: निचृद्गायत्री
स्वर: षड्जः
384 बार पढ़ा गया
मनो॒ न्वा हु॑वामहे नाराशं॒सेन॒ सोमे॑न । पि॒तॄ॒णां च॒ मन्म॑भिः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
mano nv ā huvāmahe nārāśaṁsena somena | pitṝṇāṁ ca manmabhiḥ ||
पद पाठ
मनः॑ । नु । आ । हु॒वा॒म॒हे॒ । ना॒रा॒शं॒सेन॑ । सोमे॑न । पि॒तॄ॒णाम् । च॒ । मन्म॑ऽभिः ॥ १०.५७.३
384 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:57» मन्त्र:3
| अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:19» मन्त्र:3
| मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:3
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (नाराशंसेन सोमेन) मनुष्यों की प्रशंसा करनेवाले वेदज्ञान के द्वारा, तथा (पितॄणां मन्मभिः-च) पालक ऋषियों के मननीय विचारों-अनुभवों से (मनः-नु-आ हुवामहे) मन-अन्तःकरण को शीघ्र अच्छा बनावें ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों के व्यवहार को बतानेवाले परमात्मा से प्रकाशित वेदज्ञान द्वारा तथा पालक ऋषियों के अनुभवों द्वारा मानसिक स्तर को ऊँचा बनाना चाहिए ॥३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सोम और मन्म
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नु) = अब हम (मन्म) = मन को (आहुवामहे) = सब ओर से पुकारते हैं । उस मन को, जो नाना विषयों के अन्दर भटकता है, हम उसे विषयों में भटकने से लौटाते हैं । [२] इसलिए लौटाते हैं कि नाराशंसेन सोमेन मनुष्यों से (आशंसनीय) = [ चाहने योग्य] सोम को हम अपने शरीर में सुरक्षित कर सकें। सोम शक्ति शरीर की मूलभूत शक्ति है। मन के संयम से इसका संयम होता है, मन के विषयों में जाने से इसका अपव्यय होता है । (च) = और मन को इसलिए भी विषयों से हम लौटाते हैं कि (पितॄणाम्) = पितरों के (मन्मभिः) = ज्ञानपूर्व उच्चारण किये गये स्तोत्रों का हम भी उच्चारण करनेवाले बनें। मनोनिरोध के बिना पहले तो प्रभु स्तवन का सम्भव ही नहीं, पर यदि जैसे तैसे कुछ स्तोत्रों का हम उच्चारण करें भी तो मन अन्यत्र होने से वे स्तोत्र ज्ञानपूर्वक उच्चारित न हो रहे होंगे। एवं मन को विषयों से वापिस पुकारकर शरीर में ही निरुद्ध करने के दो लाभ हैं [क] शरीर में शक्ति का रक्षण, [ख] और ज्ञानपूर्वक प्रभु का स्तवन । [३] ज्ञानपूर्वक स्तोत्रों के उच्चारण से ही वस्तुतः पितर 'पितर' बनते हैं। इन स्तोत्रों का परिणाम 'जीवन की पवित्रता' होता है। स्तोत्र इन्हें आसुरवृत्तियों के आक्रमण से बचाते हैं [पा रक्षणे] एवं स्तोत्रों द्वारा अपना रक्षण करनेवाले ये पितर हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-मन को हम विषयों से रोकें इससे शक्ति का रक्षण होगा और प्रभु का हम ज्ञानपूर्वक स्तवन कर पायेंगे ।
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (नाराशंसेन सोमेन) नराणां प्रशंसाकारकेण परमात्मज्ञानेन वेदेन “येन नराः प्रशस्यन्ते स नाराशंसः” [निरु० ९।१०] तथा (पितॄणां मन्मभिः-च) पालकर्षीणां च मननीयैर्ज्ञानैरनुभवैश्च (मनः नु-आ हुवामहे) मनोऽन्तःकरणं शीघ्रं सुसम्पादयामः ॥३॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - We invoke the mind, alert ourselves and, with songs of human approbation and celebration, join with the thoughts and wisdom of our parents and ancestors to maintain the thread of continuity.
