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मा प्र गा॑म प॒थो व॒यं मा य॒ज्ञादि॑न्द्र सो॒मिन॑: । मान्त स्थु॑र्नो॒ अरा॑तयः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mā pra gāma patho vayam mā yajñād indra sominaḥ | mānta sthur no arātayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मा । प्र । गा॒म॒ । प॒थः । व॒यम् । मा । य॒ज्ञात् । इ॒न्द्र॒ । सो॒मिनः॑ । मा । अ॒न्तरिति॑ । स्थुः॒ । नः॒ । अरा॑तयः ॥ १०.५७.१

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:57» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:1


ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में ‘विश्वेदेवाः’ से विद्यानिष्णात विद्वान् गृहीत हैं। उनसे शिक्षाप्राप्ति, वेदाध्ययन से व्यवहारज्ञानग्रहण, और संयमपूर्वक परमात्मा का श्रवणमनननिदिध्यासनसाक्षात्कार श्रवणचतुष्टय करना कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (वयं सोमिनः पथः-मा प्रगाम) हम तेरे अध्यात्मैश्वर्यवाले मार्ग से-उपदेशरूप मार्ग से कभी पृथक् न चलें (मा यज्ञात्) तथा न तेरे यजन से-सङ्गमसम्बन्ध से पृथक् हों (अरातयः-मा नः-अन्तः स्थुः) रसरक्तादि धातुओं को क्षीण करनेवाले कामादि शत्रु हमारे अन्दर या मध्य में न रहें ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को परमात्मा के उपदिष्ट वेद आदेश से पृथक् आचरण नहीं करना चाहिए। वही जीवन का सच्चा मार्ग है। आन्तरिक जीवन का शोषण करनेवाले जो कामादि दोष हैं, उनसे बचने का भी वेद द्वारा उपदिष्ट अध्यात्ममार्ग है ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अ- भ्रंश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्रभु के प्रकाश में चलते हुए (वयम्) = हम मनोनिरोध करनेवाले 'बन्धु- सुबन्धु' आदि (पथः) = मार्ग से (मा) = मत (प्रगाम) = दूर हों । मार्ग से भ्रष्ट न हों। मन वश में नहीं होता तभी इधर-उधर भटकना होता है । मन निरुद्ध हुआ तो भटकने का प्रश्न ही नहीं रहता । इन्द्रियाँ नव विषयों में जाती हैं तो यदि मन भी उनके साथ हो जाए तभी बुद्धि भ्रष्ट होती है। मन निरुद्ध रहे तो बुद्धि का भ्रंश नहीं होता । बुद्धि के ठीक रहने से हम मार्ग भ्रष्ट नहीं होते । [२] मार्ग क्या है ? यज्ञ । सो कहते हैं कि हम हे (इन्द्र) = यज्ञप्रिय प्रभो ! (यज्ञात् मा) = यज्ञ से पृथक् न हों। उस यज्ञ से जो (सोमिनः) = सोमी है। यज्ञ सोमवाला है । सोम का अभिप्राय शरीरस्थ वीर्यशक्ति है। यज्ञ से मनुष्य में वासनाएँ प्रबल नहीं होती। वासनाओं के न होने से शक्ति सुरक्षित रहती है । इसीलिए यज्ञ 'सोमी' कहा गया है। [३] इस प्रकार यज्ञों में लगे रहने पर (नः अन्त:) = हमारे अन्दर (अरातयः) = काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रु (मा अस्थुः) = मत स्थित हों। इन लोभादि शत्रुओं से आक्रान्त न होने के लिये यज्ञादि में लगे रहना ही ठीक है। उत्तम कर्मों में लगे हुए व्यक्ति को वासनाएँ सता ही नहीं पाती।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम पथभ्रष्ट न हों, यज्ञों में लगे रहें जिससे लोभादि शत्रु हमारे हृदयों में स्थान न पा सकें।

ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते ‘विश्वेदेवाः’ विद्यायां निष्णाता विद्वांसो गृह्यन्ते। तेभ्यः शिक्षाग्रहणं वेदाध्ययनेन व्यवहारज्ञानप्रापणं संयमपूर्वकं परमात्मनः श्रवणमनननिदिध्यासनसाक्षात्काराश्चेति श्रवणचतुष्टयादिकमुपदिश्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (वयं सोमिनः पथः मा प्रगाम) वयं तवाध्यात्मैश्वर्यवतो मार्गात्-उपदेशरूपात् कदापि न प्रच्यवाम, तथा (मा यज्ञात्) न हि यजनात्-सङ्गमरूपात् प्रच्यवाम (अरातयः-मा नः-अन्तः स्थुः) कामादयो रसरक्तादिधातूनामादातारो गृहीतारोऽस्माकं मध्ये न तिष्ठन्तु ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, O Lord Almighty, let us, lovers of soma peace, enlightenment and life’s joy never deviate from the path of rectitude and never forsake the creative way of yajnic living. Let no want, malignity, adversity and illiberality dwell among us.