पिता के गुणों का पुत्र पौत्रों में संचार
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्रभु को अपने में स्थापित करनेवाला व्यक्ति (पृथिव्याः प्रदिशः) पृथिवी की इन प्रकृष्ट दिशाओं को उसी प्रकार (अति) = अतिक्रान्त कर जाता है (न) = जैसे कि (क्षोदः) = पानी को [= नदी को] (नावा) = नाव से पार कर लेते हैं। यह व्यक्ति (स्वस्तिभिः) = [सु अस्ति = ] उत्तम जीवन से, जीवन के सब कार्यों को उत्तमता से करने के द्वारा (विश्वा दुर्गाणि अति) = सब कठिनताओं को पार कर जाता है। [२] प्रभु स्मरण से उत्तम जीवन को बनाकर यह (स्वां प्रजाम्) = अपने विकास को सिद्ध करता है। प्रभु स्मरण इसके लिये भवसागर को पार करने के लिये नाव के समान हो जाता है। यह (बृहदुक्थः) = प्रभु को खूब ही स्तुत करनेवाला व्यक्ति (महित्वा) = अपने महत्त्व से, अपनी 'मह पूजायाम्' इस प्रभु-पूजा की वृत्ति से (अपरेषु) = अपने सन्तानों में भी, पुत्रों में भी प्रभु पूजा के भाव को (अदधात्) = धारण करता है। पिता का स्वभाव पुत्र में संक्रान्त होना ही चाहिये। [३] पुत्र 'अवर' कहलाता है, अपने एकदम समीप होने से । पौत्र 'पर' कहलाता है, पुत्र से अन्तर्हित होकर यह हमारे से दूर [पर-far] ही हो जाता है। 'बृहदुक्थ' जहाँ अपने पुत्रों में अपने विकास को संचरित करता है, वहाँ वह इस विकास को पौत्रों में भी संचरित करनेवाला होता है । इसीलिए कहते कि (परेषु) = दूरभावी पौत्र आदि में भी (आ) = वह अपने विकास को प्राप्त कराता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का स्तोता 'बृहदुक्थ' अपने जीवन की शक्तियों का विकास करके उस विकास को पुत्र-पौत्रों में भी संचरित करनेवाला होता है। तीन ज्योतियों को धारण करने के साथ इस सूक्त का प्रारम्भ होता है [१] और प्रभु सम्पर्क से शक्ति सम्पन्न बनकर उन शक्तियों को पुत्र-पौत्रों में संचरित करने के साथ सूक्त की समाप्ति । इस प्रभु सम्पर्क के लिये मनोनिरोध आवश्यक है। मन को बाँधनेवाला 'बन्धु' ही अगले ४ सूक्तों का ऋषि है। यह उत्तमता से मन को बाँधने कारण 'सुबन्धु' है। ज्ञान प्राप्ति में, स्वाध्याय में मन को बाँधने से यह 'श्रुतबन्धु' है और अपना विशेषरूप से [वि] पूरण करने के लिये [प्रा] इस बन्धन क्रिया को करने के कारण यह 'विप्रबन्धु' है। मनोनिरोध से इन्द्रियों [गो] का उत्तमता से रक्षण करनेवाले ये 'बन्धु, सुबन्धु, श्रुतबन्धु व विप्रबन्धु' गौपायन हैं। इनकी प्रार्थना है कि-