पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि - हे (वाजिन्) = शक्ति सम्पन्न जीव ! (ते तनूः) = तेरा शरीर अपने को (तन्वम्) = [तनु विस्तारे] विस्तार को (नयन्ती) = प्राप्त कराता हुआ (वामम्) = उस सुन्दर शरीर को (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (धातु) = [ दधातु] धारण करे। हमें चाहिए कि हम [क] शक्तिशाली बनें, [ख] शरीर के सब अंगों की शक्तियों का विस्तार करें, [ग] इस शरीर को सर्वांग सुन्दर बनाकर प्रभु प्राप्ति के लिये यत्नशील हों। इस शरीर का मुख्य प्रयोजन प्रभु प्राप्ति ही है, अपवर्ग [मोक्ष] मुख्य उद्देश्य है, भोग प्रासंगिक वस्तु है । भोग को प्रासंगिक वस्तु रखने से ही शरीर 'स्वस्थ, सशक्त व सुन्दर' बनता है और हमें प्रभु प्राप्ति के योग्य बनाता है । इस प्रकार जीवन में स्वस्थ शरीर से अपवर्ग की ओर चलने पर प्रभु कहते हैं कि (तुभ्यं शर्म) = तेरे लिये कल्याण हो। [२] (अह्रुतः) = [अनवपतितः] तेरा जीवन पतित व कुटिल न हो । (महः) = प्रभु की तू पूजा करनेवाला बन । (देवान् धरुणाय) = दिव्य गुणों को धारण करने के लिये (स्वं ज्योतिः) = आत्मज्योति में (आमिमीयाः) = प्रवेश करनेवाला बन उसी प्रकार (इव) = जैसे कि (दिवि) = द्युलोक में सूर्य - ज्योति है । द्युलोकस्थ सूर्य-ज्योति के समान तू आत्मज्योति में प्रवेश कर। इस आत्मज्योति के मार्ग पर चलने से उत्तरोत्तर तेरी दैवी सम्पत्ति वृद्धि को प्राप्त होती जाएगी।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शरीर की शक्तियों का विस्तार करके शरीर को हम सुन्दर बनाएँ। इसे प्रभु प्राप्ति के लिये धारण करें । आत्मज्योति में प्रवेश करने पर हम दिव्यगुणों को धारण करनेवाले बनेंगे।