पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एभिः) = गत मन्त्र में वर्णित सत्य ज्ञानों से व स्पृहणीय धनों के ठीक प्रयोग से मैं (पौंस्यानि) = पुमान् [= पुरुष] के लिये हितकर (वृष्णया) = बलों को (आददे) = ग्रहण करता हूँ । ज्ञान से वासनाओं का क्षय होता है, वासनाक्षय शक्तिवर्धन का कारण बनता है । [२] ये शक्तियाँ वे हैं (येभिः) = जिनसे (वज्री) = [वज गतौ] क्रियाशीलता रूप वज्र को हाथों में धारण करनेवाला पुरुष (वृत्रहत्याय) = ज्ञान की आवरणभूत अतएव वृत्र नामवाली वासनाओं की हत्या के लिये (औक्षत्) = अपने को सिक्त करता है। क्रियाशीलता वासना को जीतने का साधन है और वासना विजय का परिणाम 'शक्तिवर्धन' है । [३] इस प्रकार ये जो व्यक्ति कर्मशील होते हैं वे (क्रियमाणस्य कर्मणः मह्न) = इन किये जाते हुए कर्मों की महिमा से युक्त होते हैं और (ऋते कर्मम्) = कर्म के बिना होते हैं, अर्थात् कर्म करते हैं और उसे प्रभु के अर्पण करके बिना कर्मवाले हो जाते हैं, इस प्रकार जो व्यक्ति 'कुरु कर्म त्यजेति च' [कर्म करो और छोड़ दो ] इन व्यास वचनों को जीवन में क्रियान्वित करते हैं वे (उत्) = इन कर्मों के अभिमान से ऊपर उठकर (देवा:) = देव (अजायन्त) = हो जाते हैं। देव वही है जो यज्ञात्मक उत्तम कर्मों को करता है और उन यज्ञों को भी संग व फल की इच्छा को छोड़कर ही करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानपूर्वक वसुओं का प्रयोग करते हुए शक्तिशाली बनें। कर्म करते हुए कर्म के अभिमान से ऊपर उठें, तभी हम देव बनेंगे।