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ऐभि॑र्ददे॒ वृष्ण्या॒ पौंस्या॑नि॒ येभि॒रौक्ष॑द्वृत्र॒हत्या॑य व॒ज्री । ये कर्म॑णः क्रि॒यमा॑णस्य म॒ह्न ऋ॑तेक॒र्ममु॒दजा॑यन्त दे॒वाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aibhir dade vṛṣṇyā pauṁsyāni yebhir aukṣad vṛtrahatyāya vajrī | ye karmaṇaḥ kriyamāṇasya mahna ṛtekarmam udajāyanta devāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । ए॒भिः॒ । द॒दे॒ । वृ॒ष्ण्या॒ । पौंस्या॑नि । येभिः॑ । औक्ष॑त् । वृ॒त्र॒ऽहत्या॑य । व॒ज्री । ये । कर्म॑णः । क्रि॒यमा॑णस्य । म॒ह्ना । ऋ॒ते॒ऽक॒र्मम् । उ॒त्ऽअजा॑यन्त । दे॒वाः ॥ १०.५५.७

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:55» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:17» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:7


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ये देवाः) जो मुमुक्षु (मह्ना क्रियमाणस्य कर्मणः) महत्त्व से महती शक्ति से किये जानेवाले-उत्पन्न किये जानेवाले जगत् का (ऋते कर्मम्-उत् अजायन्त) अमृतरूप मोक्ष में मोक्ष को निमित्त बनाकर अर्थात् केवल मोक्षार्थ न कि भोगार्थ सृष्टि के आरम्भ में प्रकट होते हैं (एभिः-वृष्ण्या पौंस्यानि-आ ददे) इन मुमुक्षुओं-ऋषियों के द्वारा मानवहितार्थ वेदवचनों को समन्तरूप से अर्थात् भली-भाँति प्रदान करता है (येभिः-वज्री वृत्रहत्याय-औक्षत्) वह ओजस्वी परमात्मा जिन वेदवचनों के द्वारा उनको ज्ञानवृद्ध बनाता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - आरम्भसृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों द्वारा मानव कल्याण के लिए परमात्मा ने वेदों का प्रकाश किया है। वे चार ऋषि केवल वेदप्रकाशनार्थ तथा मोक्षप्राप्ति के निमित्त ही प्रकट हुए थे, भोगार्थ नहीं ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'कुरु कर्म त्यजेति च'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एभिः) = गत मन्त्र में वर्णित सत्य ज्ञानों से व स्पृहणीय धनों के ठीक प्रयोग से मैं (पौंस्यानि) = पुमान् [= पुरुष] के लिये हितकर (वृष्णया) = बलों को (आददे) = ग्रहण करता हूँ । ज्ञान से वासनाओं का क्षय होता है, वासनाक्षय शक्तिवर्धन का कारण बनता है । [२] ये शक्तियाँ वे हैं (येभिः) = जिनसे (वज्री) = [वज गतौ] क्रियाशीलता रूप वज्र को हाथों में धारण करनेवाला पुरुष (वृत्रहत्याय) = ज्ञान की आवरणभूत अतएव वृत्र नामवाली वासनाओं की हत्या के लिये (औक्षत्) = अपने को सिक्त करता है। क्रियाशीलता वासना को जीतने का साधन है और वासना विजय का परिणाम 'शक्तिवर्धन' है । [३] इस प्रकार ये जो व्यक्ति कर्मशील होते हैं वे (क्रियमाणस्य कर्मणः मह्न) = इन किये जाते हुए कर्मों की महिमा से युक्त होते हैं और (ऋते कर्मम्) = कर्म के बिना होते हैं, अर्थात् कर्म करते हैं और उसे प्रभु के अर्पण करके बिना कर्मवाले हो जाते हैं, इस प्रकार जो व्यक्ति 'कुरु कर्म त्यजेति च' [कर्म करो और छोड़ दो ] इन व्यास वचनों को जीवन में क्रियान्वित करते हैं वे (उत्) = इन कर्मों के अभिमान से ऊपर उठकर (देवा:) = देव (अजायन्त) = हो जाते हैं। देव वही है जो यज्ञात्मक उत्तम कर्मों को करता है और उन यज्ञों को भी संग व फल की इच्छा को छोड़कर ही करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानपूर्वक वसुओं का प्रयोग करते हुए शक्तिशाली बनें। कर्म करते हुए कर्म के अभिमान से ऊपर उठें, तभी हम देव बनेंगे।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ये देवाः) ये मुमुक्षुवः (मह्ना क्रियमाणस्य कर्मणः) महत्त्वेन महच्छक्त्या क्रियमाणस्य-उत्पाद्यमानस्य जगतः “जगद्वाचित्वात्” [वेदान्त०] (ऋते कर्मम्-उत्-अजायन्त) अमृते मोक्षे “ऋतममृतमित्याह” [जै० २।१६०] मोक्षं निमित्तीकृत्य कर्म प्रति केवलं मोक्षार्थम्, न तु भोगार्थम् उद्भवन्ति सृष्टेरादौ-प्रकटीभवन्ति (एभिः-वृष्ण्या पौंस्यानि-आददे) एतैर्मुमुक्षुभिर्ऋषिभिः पुमर्थानि वेदवचनानि “पौंस्यानि वचनानि” [ऋ० ६।३६।३ दयानन्दः] मनुष्यमात्राय समन्ताद् ददाति (येभिः-वज्री बृत्रहत्याय-औक्षत्) स ओजस्वी ‘वज्रो वा ओजः” [श० ८।४।१।२०] यैर्वचनैर्वेदवचनैस्तान् ज्ञानवृद्धान् करोति “उक्षतेर्वृद्धिकर्मणः” [निरु १२।९] ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - With these potent and positive waves of natural energy, the virile Indra, wielder of thunderbolt, assumes those powers for breaking the clouds of darkness and want by which he brings about the showers of rain for the world of existence, which powers too for bringing about the showers of positive action and creativity arise from the grandeur of the omnipotent original doer of cosmic karma.