पदार्थान्वयभाषाः - [१] (त्वष्टा) = वह संसार का निर्माता प्रभु (माया:) = [wisdom = ज्ञान ] सब ज्ञानों को वेद-जानता है और (अपसां अपस्तमः) = सर्वाधिक क्रियाशील है। प्रभु के सब कर्म ज्ञानमूलक होने से निर्दोष हैं, प्रभु की सब कृतियाँ पूर्ण हैं । [२] वे प्रभु ही (पात्रा) = इन शरीर रूप पात्रों को बिभ्रत्-धारण करते हैं, जो पात्र देवपानानि देवों के लिये सोमपान के साधन होते हैं। 'सोम' शरीर में उत्पन्न होनेवाली वीर्यशक्ति है, देव इस शक्ति को शरीर में ही सुरक्षित करते हैं। इस सोम के रक्षण से ही (शन्तमा) = ये शरीर रूप पात्र अत्यन्त शान्ति को लिये हुए होते हैं। इनमें आधि-व्याधियों की अशान्ति नहीं होती। [३] वे प्रभु ही (नूनम्) = निश्चय से (स्वायसम्) = उत्तम लोहे के बने हुए (परशुम्) = शत्रुओं को क्षीण करनेवाले [ परान् श्यति] मन रूप कुल्हाड़े को (शिशीते) = तीव्र बनाते हैं। दृढ़ संकल्पयुक्त होना ही मन का लोहे से बना हुआ होना है। ऐसा व्यक्ति ही 'लोह पुरुष' कहलाता है। यह दृढ़ संकल्पवाला मन सब वासनारूप शत्रुओं को नष्ट करनेवाला बनता है। [४] यह 'स्वायस परशु' वह है (येन) = जिससे (एतशः) = [एते शेते, एत-चित्र] विविध विज्ञानों में निवास करनेवाला (ब्रह्मणस्पतिः) = ज्ञानी पुरुष (वृश्चात्) = सब बुराइयों को छिन्न करता है। बुराइयों को छिन्न करके वह संसारवृक्ष को भी छिन्न करनेवाला बनता है और मोक्ष का लाभ प्राप्त करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ज्ञानी व सर्वोत्तम क्रियाशील हैं। प्रभु ने हमें यह सुन्दर शरीर रूप पात्र दिया है, इसमें दृढ़ संकल्पवाला मन ही वह परशु है जिससे कि हम वासना को छिन्न करके मुक्त हो पाते हैं ।