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पञ्च॒ जना॒ मम॑ हो॒त्रं जु॑षन्तां॒ गोजा॑ता उ॒त ये य॒ज्ञिया॑सः । पृ॒थि॒वी न॒: पार्थि॑वात्पा॒त्वंह॑सो॒ऽन्तरि॑क्षं दि॒व्यात्पा॑त्व॒स्मान् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pañca janā mama hotraṁ juṣantāṁ gojātā uta ye yajñiyāsaḥ | pṛthivī naḥ pārthivāt pātv aṁhaso ntarikṣaṁ divyāt pātv asmān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पञ्च॑ । ज॒नाः॒ । मम॑ । हो॒त्रम् । जु॒ष॒न्ता॒म् । गोऽजा॑ताः । उ॒त । ये । य॒ज्ञिया॑सः । पृ॒थि॒वी । नः॒ । पार्थि॑वात् । पा॒तु॒ । अंह॑सः । अ॒न्तरि॑क्षम् । दि॒व्यात् । पा॒तु॒ । अ॒स्मान् ॥ १०.५३.५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:53» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:13» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पञ्चजनाः-मम होत्रं जुषन्ताम्) मनुष्य मेरे ह्वान-वचन को सेवन करें (गोजाताः-उत ये यज्ञियासः) वेदवाणी के अन्दर जो निष्णात हैं तथा जो कर्मकाण्डी हैं, (पृथिवी नः पार्थिवात्-अंहसः-अस्मान् पातु) सम्यग् वेदोपदेश का स्मरण करते हुए हम लोगों की पृथिवी, पृथिवीसम्बन्धी दोष से रक्षा करे (अन्तरिक्षं दिव्यात् पातु) आकाश आकाशसम्बन्धी अर्थात् वृष्टिदोष से हमारी रक्षा करे ॥५॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ आश्रमी की आकाङ्क्षा-प्रार्थना होनी चाहिए कि उसके वचन को वेद-निष्णात और कर्मकाण्डी विद्वान् सुनें तथा उसका व्यवहार भी ऐसा होना चाहिए कि पृथिवी के पार्थिव दोषों से-उपद्रवों से बचा रहे और आकाश के आकाशीय वृष्टि-अतिवृष्टि आदि आघातों से बचा रहे ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वेदज्ञान व यज्ञ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो (गोजाता:) = [गवि जाता: ] इस वेदवाणी में निपुण बने हैं (उत) = और (ये) = जो (यज्ञियासः) = यज्ञ की वृत्तिवाले हैं वे (पञ्च जनाः) = लोग (मम होत्रम्) = मेरे इस यज्ञ को, वेदवाणी में मेरे द्वारा उपदिष्ट यज्ञ को (जुषन्ताम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करें। इसलिए वे यज्ञ का सेवन करें कि (पृथिवी) = यह भूमिमाता पार्थिवात् पृथिवी सम्बन्धी (अंहसः) = कष्ट से (नः पातु) = हमें बचाए । पृथिवी सम्बन्धी कष्ट यही तो है कि अन्न का उत्पादन खूब हो और किसी प्रकार के अन्न की कमी न रहे तथा इसलिए भी यज्ञ करना कि (अन्तरिक्षम्) = अन्तरिक्ष (अस्मान्) = हमें (दिव्यात् अंहसः पातु) = अन्तरिक्षलोक से होनेवाले कष्ट से बचाये । अन्तरिक्षलोक का कष्ट यह है कि वायु दुर्गन्धित होकर रोगों का कारण बन जाती है। यज्ञों से रोगकृमियों का संहार होता है, वायु के दुर्गन्ध का नाश होता है। इस प्रकार रोगों का भय नहीं रहता । यज्ञों से सारा वायुमण्डल पवित्र हो जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम वेदज्ञान में निपुण बनें और वेद प्रतिपादित यज्ञों का सेवन करते हुए अन्नाभाव व रोगों के कष्टों से ऊपर उठें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पञ्चजनाः मम होत्रं जुषन्ताम्) मनुष्याः-खलु मम ह्वानं वचनं सेवन्ताम् (गोजाताः-उत ये यज्ञियासः) वेदवाचि जाता निष्णाताः, तथा ये यज्ञार्हाः कर्मकाण्डिनः (पृथिवी नः पार्थिवात् अंहसः-अस्मान् पातु) सम्यग्वेदोपदेशमनुसरतोऽस्मान् पृथिवी, पृथिवीसम्बन्धिनो दोषादस्मान् पातु-रक्षति-रक्षिष्यति (अन्तरिक्षं दिव्यात् पातु) अन्तरिक्षमाकाशः, दिविभवादाकाशभवाद् दोषादतिवृष्ट्यादेर्दोषाद् रक्षतु-रक्षिष्यति ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let the people of all five classes and communities listen to my call to action, children of the earth, lovers of the common voice of divinity, and all of those dedicated to united action for creativity and production, and may mother earth protect us against sin and evil earthly, and may the skies protect us against all dangers from the space above.