पदार्थान्वयभाषाः - [१] वह (होता) = सब पदार्थों का देनेवाला प्रभु (अराधि) = हमारे से आराधना किया गया है। (यजीयान्) = सर्वाधिक पूजनीय वे प्रभु (निषदा) = हमारे अन्दर निषण्ण हैं। वे प्रभु (सुधितानि) = उत्तमता से धारण किये गये, स्थापित किये गये (प्रयांसि) = यज्ञों को [srerifice ] (हि) = निश्चय से (अभिख्यत्) = [अभिचष्टे ] देखते हैं। हमारे से किये जानेवाले यज्ञों का वे रक्षण करते हैं। 'प्रयस्' शब्द भोजन का भी वाचक है। वे प्रभु (सुधित) = उत्तमता से धारण किये गये भोजनों को देखते हैं, अर्थात् हमें प्रातः-सायं उत्तम भोजनों को प्राप्त कराते हैं, [२] प्रभु हमारा रक्षण करते हैं और हम (हन्त) = शीघ्र (यज्ञियान् देवान्) = संगतिकरण योग्य देवों का (यजामहै) = संग करते हैं । और (ईड्यान्) = स्तुति के योग्य देवों का (आज्येन) = घृत आदि पदार्थों से ईडामहा= स्तवन करते हैं। विद्वानों के सम्पर्क में आकर ज्ञान का व दिव्यगुणों का अपने में वर्धन करते हैं और अग्निहोत्र में घृतादि की आहुति के द्वारा स्तुति के योग्य वायु आदि देवों का स्तवन करते हैं। ये वायु आदि देव इस प्रकार यज्ञों से आराधित हुए हुए हमारे स्वास्थ्य को सिद्ध करते हैं । [३] प्रस्तुत मन्त्र के पूर्वार्ध में हृदयस्थ सर्वाधिक पूज्य प्रभु का आराधन है। तीसरे चरण में विद्वानों के संग का संकेत है और चतुर्थ चरण में वायु आदि देवों का यज्ञों में घृताहुति से उपासन है। प्रभु की आराधना से उत्तम प्रेरणा व ज्ञान प्राप्त होता है, विद्वानों के सम्पर्क से दिव्य गुणों का वर्धन होता है, वायु आदि का उपासन स्वास्थ्य का साधन बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का, विद्वानों का व वायु आदि देवों का आराधन, संग व उपासन करते हैं।