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अरा॑धि॒ होता॑ नि॒षदा॒ यजी॑यान॒भि प्रयां॑सि॒ सुधि॑तानि॒ हि ख्यत् । यजा॑महै य॒ज्ञिया॒न्हन्त॑ दे॒वाँ ईळा॑महा॒ ईड्याँ॒ आज्ये॑न ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

arādhi hotā niṣadā yajīyān abhi prayāṁsi sudhitāni hi khyat | yajāmahai yajñiyān hanta devām̐ īḻāmahā īḍyām̐ ājyena ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अरा॑धि । होता॑ । नि॒ऽसदा॑ । यजी॑यान् । अ॒भि । प्रयां॑सि । सुऽधि॑तानि । हि । ख्यत् । यजा॑महै । य॒ज्ञिया॑न् । हन्त॑ । दे॒वान् । ईळा॑महै । ईड्या॑न् । आज्ये॑न ॥ १०.५३.२

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:53» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:13» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:2


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (निषदा) नियत स्थान में (यजीयान् होता-अराधि) शरीरयज्ञ का संचालक अथवा विद्वानों का अत्यन्त संगमनशील-संगतिकर्ता, बुलानेवाला अनुकूल बना लिया गया (प्रयांसि सुधितानि हि-अभिख्यत्) प्रीतिकर सुखों को जो दिखाता है या जनाता है, अतः (यजीयान् यजामहे) उसके आगमन से यज्ञयोग्यों-पूजायोग्यों को प्रसन्नता से या उसके आदेश से हम पूजते हैं (हन्त) अहो (देवान्-ईळामहै) विद्वानों को प्रशंसित करते हैं (आज्येन-ईड्यान्) स्नेहपूर्ण द्रव्य से स्तुति करने योग्यों को पूजते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - जब बालक विद्वानों की शरण में रहकर विद्वान् बन जाता है, तो घरवाले उसका स्वागत करें। उसके साथ में अन्य विद्वानों का भी स्वागत करें और स्निग्ध द्रव्यों का उपहार उन्हें दें ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आराधन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वह (होता) = सब पदार्थों का देनेवाला प्रभु (अराधि) = हमारे से आराधना किया गया है। (यजीयान्) = सर्वाधिक पूजनीय वे प्रभु (निषदा) = हमारे अन्दर निषण्ण हैं। वे प्रभु (सुधितानि) = उत्तमता से धारण किये गये, स्थापित किये गये (प्रयांसि) = यज्ञों को [srerifice ] (हि) = निश्चय से (अभिख्यत्) = [अभिचष्टे ] देखते हैं। हमारे से किये जानेवाले यज्ञों का वे रक्षण करते हैं। 'प्रयस्' शब्द भोजन का भी वाचक है। वे प्रभु (सुधित) = उत्तमता से धारण किये गये भोजनों को देखते हैं, अर्थात् हमें प्रातः-सायं उत्तम भोजनों को प्राप्त कराते हैं, [२] प्रभु हमारा रक्षण करते हैं और हम (हन्त) = शीघ्र (यज्ञियान् देवान्) = संगतिकरण योग्य देवों का (यजामहै) = संग करते हैं । और (ईड्यान्) = स्तुति के योग्य देवों का (आज्येन) = घृत आदि पदार्थों से ईडामहा= स्तवन करते हैं। विद्वानों के सम्पर्क में आकर ज्ञान का व दिव्यगुणों का अपने में वर्धन करते हैं और अग्निहोत्र में घृतादि की आहुति के द्वारा स्तुति के योग्य वायु आदि देवों का स्तवन करते हैं। ये वायु आदि देव इस प्रकार यज्ञों से आराधित हुए हुए हमारे स्वास्थ्य को सिद्ध करते हैं । [३] प्रस्तुत मन्त्र के पूर्वार्ध में हृदयस्थ सर्वाधिक पूज्य प्रभु का आराधन है। तीसरे चरण में विद्वानों के संग का संकेत है और चतुर्थ चरण में वायु आदि देवों का यज्ञों में घृताहुति से उपासन है। प्रभु की आराधना से उत्तम प्रेरणा व ज्ञान प्राप्त होता है, विद्वानों के सम्पर्क से दिव्य गुणों का वर्धन होता है, वायु आदि का उपासन स्वास्थ्य का साधन बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का, विद्वानों का व वायु आदि देवों का आराधन, संग व उपासन करते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (निषदा) नियतस्थाने ‘आकारादेशश्छान्दसः’ (यजीयान् होता-अराधि) शरीरयज्ञस्य सञ्चालको विदुषां वाऽतिसङ्गमनशीलो ह्वाता संसाधितोऽनुकूलीकृतः (प्रयांसि सुधितानि हि-अभिख्यत्) प्रीतिकराणि सुहितानि सुखानि हि योऽभिदर्शयति ज्ञापयति वा, अतः (यज्ञियान् यजामहे) तदागमनेन यज्ञार्हान् पूजायोग्यान् प्रसन्नतया तदादेशेन वा पूजयामः (हन्त) अहो (देवान्-ईळामहै) विदुषः प्रशंसामः (आज्येन-ईड्यान्) स्नेहद्रव्येण “आज्यस्य स्नेहद्रव्यस्य” [यजु० ६।१६ दयानन्दः] स्तोतव्यान् पूजयामः ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The high priest, Agni, lovable and adorable, is seated on the vedi. Honoured and adored, he also observes with interest and favour the sacred offerings placed with faith and reverence on the vedi in homage. We adore and worship all the divine powers that deserve and command our worship and adoration. They deserve service and we adore and worship them with the homage of ghrta and fragrant havi.