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गर्भे॒ योषा॒मद॑धुर्व॒त्समा॒सन्य॑पी॒च्ये॑न॒ मन॑सो॒त जि॒ह्वया॑ । स वि॒श्वाहा॑ सु॒मना॑ यो॒ग्या अ॒भि सि॑षा॒सनि॑र्वनते का॒र इज्जिति॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

garbhe yoṣām adadhur vatsam āsany apīcyena manasota jihvayā | sa viśvāhā sumanā yogyā abhi siṣāsanir vanate kāra ij jitim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

गर्भे॑ । योषा॑म् । अद॑धुः । व॒त्सम् । आ॒सनि॑ । अ॒पी॒च्ये॑न । मन॑सा । उ॒त । जि॒ह्वया॑ । सः । वि॒श्वाहा॑ । सु॒ऽमनाः॑ । यो॒ग्याः । अ॒भि । स॒सा॒सनिः॑ । व॒न॒ते॒ । का॒रः । इत् । जिति॑म् ॥ १०.५३.११

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:53» मन्त्र:11 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:14» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:11


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (येषां गर्भे वत्सम्-अदधुः) वाणी के अन्दर वक्तव्य अर्थात् अभिप्राय को विद्वान् धारण करते हैं (आसनि) और मुख में बोलने योग्य वचन को धारण करते हैं (अपीच्येन मनसा-उत जिह्वया) अन्तर्हित मन से तथा जिह्वा से उसे प्रकट-प्रकाशित करते हैं (सः-कारः) वह स्तुतिकर्त्ता (सुमनाः) प्रसन्नमन या शुद्धमनवाला होकर (विश्वाहा योग्याः) सदा योग्य वाणियाँ-स्तुतियाँ (अभि सिषासनिः) सम्यक् समर्पित करता हुआ परमात्मा के प्रति प्राप्त कराता हुआ (जितिम्-इत्-वनते) जीवन में विजय को सफलता को सेवन करता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग विद्या के अन्दर जो अभिप्राय होता है, उसे अपने अन्दर धारण करते हैं, अन्यों के लिए मौखिक प्रवचन करते हैं। इसी प्रकार मन और वाणी से परमात्मा की स्तुति करके अपने जीवन को सफल बनाते हैं ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'प्रणवो धनुः ० '

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के कवि-तत्त्वद्रष्टा लोग (गर्भे) = अपने हृदय देश में (योषाम्) = इन बुराइयों को दूर करनेवाली व अच्छाइयों से मेल करनेवाली वेदवाणी रूप योषा को (अदधुः) = स्थापित करते हैं। पिछले मन्त्र में यही भाव 'विद्वांसः पदा गुह्यानि कर्तन' इन शब्दों से कहा गया था । [२] (वत्सम्) = इस वेदवाणी से प्रतिपादित होने के कारण इसके वत्स तुल्य 'अग्नि ई वै ब्रह्मणो वत्सः ' [जै० उ० २ । १३ । १] उस अग्नि नामक प्रभु को (आसन्) = मुख में धारण करते हैं, अर्थात् मुख से उस प्रभु के ही नाम-स्मरण को करते हैं । 'वदति इति वत्सः ' इस व्युत्पत्ति से वेदवाणी का सृष्टि प्रारम्भ में उच्चारण करनेवाले प्रभु ही वत्स हैं, उन प्रभु को ये लोग सदा स्मरण करते हैं । (अपीच्येन मनसा) = अन्तर्हित मन से, विषयों की ओर जाने से रोककर मन को हृदय में ही प्रतिष्ठित करने के द्वारा इस प्रभु का साक्षात्कार होता है, इसी अन्तर्निरुद्ध मन से ही प्रभु के नाम का मनन होता है । (उत) = और (जिह्वया) = जिह्वा से । ये लोग जिह्वा से प्रभु के नाम का जप करते हैं [ तज्जपः ] और निरुद्ध मन से उस नाम के अर्थ का चिन्तन करते हैं [तदर्थ भावनम्] । [३] (स) = इस प्रकार जप व भावन करने वाला वह व्यक्ति (विश्वाहा) = सदा (सुमनाः) = उत्तम मनवाला होता है प्रभु के स्मरण से सौमनस्य क्यों न प्राप्त होगा ? यह (सिषासनिः) = प्रभु का सम्भजन करनेवाला व्यक्ति (योग्याः अभिवनते) = [योग्या - lxercise लक्ष्यवेध की काया में] लक्ष्यवेध के अभ्यासों में विजय को प्राप्त करता है [वभ् win] | क्षत्रिय लोग जैसे शराभ्यास करते हुए लक्ष्यवेध का प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार यह उपासक प्रणव को धनुष बनाकर तथा आत्मा को ही शर बनाकर ब्रह्मरूप लक्ष्य का वेध करने का प्रयत्न करता है । अभ्यास के द्वारा इसमें विजयी बनता है और इत्- निश्चय से जितिं कार- विजय को करनेवाला होता है। इस लक्ष्यवेध में विजेता बनकर यह होता है और अमृतत्व को प्राप्त करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वेदवाणी को हम हृदय में धारण करें। प्रभु के नाम का जप व उसके अर्थ का भावन करें । ब्रह्मरूप लक्ष्य का वेध करें, विजयी बनें। सूक्त के प्रारम्भ में यही कहा था कि 'यमैच्छाम मनसा सोऽयमागात् ' = जिस प्रभु की हमने कामना की थी वे प्रभु आये हैं । [१] यहाँ समाप्ति पर उस प्रभु में ही मिल जाने का उल्लेख है, [२] एवं यह सूक्त प्रभु के उत्कृष्ट उपासन का प्रतिपादन कर रहा है। अब प्रभु को प्राप्त करनेवाला खूब ही उस प्रभु का स्तवन करता है सो 'बृहदुक्थः ' कहलाता है और सुन्दर दिव्यगुणोंवाला होने से 'वामदेव्य' बनता है। यह 'बृहदुक्थ वामदेव्य' प्रार्थना करता है कि-

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (योषां गर्भे वत्सम्-अदधुः) योषाया वाचः ‘षष्ठीस्थाने व्यत्ययेन द्वितीया’ गर्भे-मध्ये “योषा हि वाक्” [श० १।४।४।४] वक्तव्यमभिप्रायं विद्वांसो धारयन्ति (आसनि) मुखे च वक्तव्यम् (अपीच्येन मनसा-उत जिह्वया) अन्तर्हितेन मनसा जिह्वया च प्रकटयन्ति (सः-कारः) स स्तुतिकर्त्ता (सुमनाः) शुद्धमनाः सन् (विश्वाहा योग्याः-अभि सिषासनिः) सर्वदा योग्या वाचः-स्तुतीः सम्भाजयमानः परमात्मानं प्रति प्रापयन् (जितिम्-इत्-वनते) जीवने विजयं साफल्यं सेवते ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The devas, seekers of divinity, hold the Word of omniscience like the sacred vedi fire in the depth of their mind alongwith the reality of existence signified by the Word, and they hold it with the sense of clarity of expression by their tongue controlled and disciplined in the mouth. Indeed such a man of divine word and action in control is always happy at heart and all round efficient, and only such a man wins the victory prizes of life.