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आ वो॑ यक्ष्यमृत॒त्वं सु॒वीरं॒ यथा॑ वो देवा॒ वरि॑व॒: करा॑णि । आ बा॒ह्वोर्वज्र॒मिन्द्र॑स्य धेया॒मथे॒मा विश्वा॒: पृत॑ना जयाति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā vo yakṣy amṛtatvaṁ suvīraṁ yathā vo devā varivaḥ karāṇi | ā bāhvor vajram indrasya dheyām athemā viśvāḥ pṛtanā jayāti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । वः॒ । य॒क्षि॒ । अ॒मृत॒ऽत्वम् । सु॒ऽवीर॑म् । यथा॑ । वः॒ । दे॒वाः॒ । वरि॑वः । करा॑णि । आ । बा॒ह्वोः । वज्र॑म् । इन्द्र॑स्य । धेया॑म् । अथ॑ । इ॒माः । विश्वाः॑ । पृत॑नाः । ज॒या॒ति॒ ॥ १०.५२.५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:52» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:12» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे विद्वानो ! (वः) तुम्हारी (यथा वरिवः कराणि) जैसे मैं परिचर्या करता हूँ (वः-सुवीरम्-अमृतत्वम्-आयक्षि) उसी प्रकार तुम्हारे श्रेष्ठ ज्ञानबल को-अमृतरूप को अपने में धारण करता हूँ (इन्द्रस्य वज्रं बाह्वोः-आधेयाम्) ऐश्वर्यवान् परमात्मा के ज्ञानमय ओज, अज्ञान के बाधक आत्मा और मन के अन्दर करता हूँ (अथ-इमाः-विश्वाः पृतनाः-जयाति) पुनः इन सारी विरोधी वासनाओं को मनुष्य जीत लेता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - जिज्ञासु को विद्वानों की सेवा करनी चाहिए, जिससे कि विद्वानों से ज्ञानबल और आत्मिक बल प्राप्त हो सके एवं परमात्मा की उपासना भी करनी चाहिए। अज्ञाननाशक परमात्मा के ओज को अपने मन और आत्मा में धारण करके वासनाओं पर विजय पानी चाहिए ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अमृतत्व सुवीर-धन'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि (देवाः) = हे देवो ! मैं (वः) = आपके साथ (अमृतत्वम्) = अमरता व नीरोगता का (आयक्षि) = सम्पर्क करता हूँ । (सुवीरम्) = उत्तम सन्तानों को संगत करता हूँ। उसी प्रकार नीरोगता व उत्तम सन्तानों को प्राप्त कराता हूँ (यथा) = जैसे (वः) = तुम्हें (वरिवः कराणि) = धन देता हूँ। गत मन्त्र के अनुसार ज्ञानी प्रभु से निर्दिष्ट यज्ञों को करनेवाले बनते हैं और प्रभु इन्हें नीरोगता, उत्तम सन्तान व धन प्राप्त कराते हैं । [२] प्रभु कहते हैं कि मैं (इन्द्रस्य) = देवों के सम्राट् इस जितेन्द्रिय पुरुष की (बाह्वोः) = भुजाओं में (वज्रम्) = क्रियाशीलता रूप वज्र को (आधेयाम्) = स्थापित करता हूँ। इस जितेन्द्रिय पुरुष के जीवन को मैं खूब ही क्रियाशील बनाता हूँ । अथ अब इस क्रियाशीलता से यह इन्द्र (इमाः) = इन (विश्वाः) = सब (पृतनाः) = संग्रामों को (जयाति) = जीतता है । क्रियाशीलता के होने पर काम-क्रोधादि का आक्रमण होता ही नहीं। यही इनको क्रियाशीलता के द्वारा पराजित करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - देव प्रभु प्रतिपादित यज्ञों को करते हैं। प्रभु इन्हें नीरोगता, उत्तम सन्तान व धन प्राप्त कराते हैं तथा इन्हें वह क्रियाशीलता प्राप्त कराते हैं जिससे कि ये काम-क्रोधाधि को संग्राम में पराजित करनेवाले होते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे विद्वांसः ! (वः) युष्माकम् (यथा वरिवः कराणि) यथा हि परिचर्यां करोमि, तथैव (वः-सुवीरम् अमृतत्वम्-आयक्षि) युष्माकं सुबलं सुष्ठुज्ञानबलं खल्वमृतरूपं स्वस्मिनादधे समन्ताद् धारयामि (इन्द्रस्य वज्रं बाह्वोः आधेयाम्) ऐश्वर्यवतः परमात्मनो ज्ञानमयमोजः “वज्रो वा ओजः” [श० ८।४।१।२०] अज्ञानबाधकयोरात्ममनसो-रभ्यन्तरे ह्यादधामि (अथ-इमाः-विश्वाः पृतनाः-जयाति) अनन्तर-मिमाः सर्वा विरोधिन्यो वासना मनुष्यो जयति ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O devas, as I do honour and service to you in the best manner, as I pray for your gifts of immortality, virility and vitality, and as I hold in hands the ruler’s thunderbolt of justice and dispensation, this way does man win all the battles of life.